ऋषभदेव जैन मंदिर, उदयपुर
धुलेव (उदयपुर) कोयल नदी के तट पर आदि तीर्थंकर भगवान ऋषभदेव का विशाल मंदिर स्थित है। यह मंदिर 1100 खम्भों पर बना है तथा यहाँ 23वें तीर्थंकर पार्श्वनाथ की पद्मासन मुद्रा में मूर्ति है, तो वहीं चैत्र कृष्ण अष्टमी को यहाँ मेला भरता है तथा भील इनकी झूठी सौगंध नहीं खाते हैं। इस मंदिर में दिगम्बर, श्वेताम्बर, वैष्णव, शैव, भील आदि सभी वर्गों के लोग पूरी श्रद्धा के साथ भगवान की पूजा-उपासना करते हैं। यहाँ भगवान की अर्चना में केसर का भरपूर उपयोग होता है। इस तीर्थ को ‘केसरियाजी केसरियानाथजी / धुलेव का धणी/कालाजी’ के नाम से भी जाना जाता है।
देलवाड़ा के जैन मंदिर (सिरोही)
माउण्ट आबू (सिरोही) के बस अड्डे से लगभग डेढ़ मील की दूरी पर देलवाड़ा के मन्दिर स्थित है। देलवाड़ा के जैन मंदिरों का निर्माण 11वीं से 15वीं के मध्य में हुआ था। यहाँ कुल पाँच प्रमुख मंदिर स्थित है-
(i) विमल वसही/आदिनाथ (ऋषभदेव) जैन मंदिर – यह देलवाड़ा के जैन मंदिरों में प्रमुख मंदिर है जिसका निर्माण गुजरात के सोलंकी राजा भीमदेव के मंत्री विमलसाह ने आबू के तत्कालीन परमार राजा घुंघरू से भूमि लेकर 1031 ई. में करवाया था, इसी कारण इसे विमल वसही मंदिर कहते हैं। इस मंदिर का शिल्पी कीर्तिधर था।
ध्यातव्य रहे – कर्नल जेम्स टॉड ने इस मंदिर के बारे में कहा है कि ‘भारत देश के भवनों में ताजमहल के बाद यदि कोई भवन है तो वह विमलवसही का मंदिर है।’ आदिनाथ की मूर्ति सप्त धातु से बनी है जिनकी आँखों में हीरे लगे हुये हैं।
(ii) लूणवसही नेमिनाथ का जैन मंदिर – यह मंदिर देलवाड़ा के जैन मंदिरों के समूह में दूसरा प्रमुख मंदिर है। इस मंदिर का निर्माण चालुक्य राजा वीर धवल के महामंत्री तेजपाल व वास्तुपाल ने 1230-31 ई. में महान शिल्पी शोभनदेव के निर्देशन में करवाया था। यह मंदिर जैनियों के 22वें तीर्थंकर नेमिनाथ का है। इस मंदिर को ‘देवरानी-जेठानी का मंदिर’ भी कहते हैं।
(iii) पित्तलहर या भीमाशाह का जैन मंदिर – इसका निर्माण भीमाशाह द्वारा करवाया गया था जिस कारण इसको भीमाशाह मंदिर कहा जाता है, तो वहीं इस मंदिर में जैन धर्म के प्रथम तीर्थंकर आदिनाथ/ऋषभदेव की 108 मन की पीतल की मूर्ति होने के कारण इसको पित्तलहर मंदिर कहा जाता है।
(iv) पार्श्वनाथ जैन मंदिर – यह तीन मंजिला मंदिर है जिसके गर्भगृह में जैन धर्म के 23वें तीर्थंकर पार्श्वनाथ की मूर्ति स्थापित है, तो वहीं इसे सिलावटों का मंदिर भी कहा जाता है।
(v) महावीर स्वामी जैन मंदिर – यह मंदिर जैन धर्म के अंतिम व 24वें तीर्थंकर महावीर स्वामी का है।

नाकोड़ा का पार्श्वनाथ मंदिर, बाड़मेर
बालोतरा (बाड़मेर) से दूर भाकरिया नामक पहाड़ी पर स्थित मरू प्रदेश का यह अभिनव तीर्थ नाकोड़ा, मेवा नगर/ वीरमपुर के नाम से जाना जाता है जो पार्श्वनाथ के जैन मंदिर के लिए प्रसिद्ध है। भक्त इन्हें ‘जागती जोत एवं हाथ का हुजूर’ कहते हैं। नाकोड़ा बाड़मेर जिले में स्थित प्रसिद्ध जैन धार्मिक केन्द्र है। यहाँ पौष बदी दशमी को पार्श्वनाथ का जन्म महोत्सव मनाया जाता है तथा चाँदी के रथ पर पार्श्वनाथ की शोभायात्रा निकाली जाती है। इस मंदिर के पास भैरवजी, रणछोड़जी, शिवजी व हनुमान जी के मंदिर हैं। 23 वें तीर्थंकर पार्श्वनाथ की मूर्ति 1511 ई. में आचार्य कीर्ति रत्न सूरि द्वारा स्थापित की गई थी।
रणकपुर जैन मंदिर (पाली)
रणकपुर (पाली) का जैन मंदिर उत्तरी भारत के श्वेताम्बर जैन मंदिरों में अपना विशिष्ट स्थान रखता है। यहाँ स्थित मंदिरों में तीन जैन मंदिर व एक वैष्णव मंदिर है।
(i) आदिनाथ (ऋषभदेव) जैन मंदिर –
मथाई नदी के किनारे स्थित इस मंदिर की भूमि पोसवाल धरणशाह सेठ ने मेवाड़ के महाराणा कुंभा से खरीदी थी ओर उसी धरणशाह ने इस मंदिर का निर्माण करवाया था अतः इसे ‘धरणी विहार’ भी कहते हैं। इस मंदिर को ‘रणकपुर का चौमुखा मंदिर’ कहते हैं। इस मंदिर में कुल 24 मण्डप, 84 शिखर और 1444 स्तंभ हैं। स्तंभों को इस प्रकार खड़ा किया गया है कि मंदिर में कहीं भी खड़े होने पर सामने की प्रतिमा दिखाई देती हैं, इसी कारण इसे ‘स्तंभों का वन’ कहते हैं। मंदिर के मुख्य द्वार की छत पर तीर्थंकर ऋषभदेव की माता मारूदेवी की हाथी पर आसीन प्रतिमा है। प्रसिद्ध वास्तुशास्त्री फर्ग्यूसन ने कहा है, कि “मैं अन्य ऐसा कोई भवन नहीं जानता जो इतना रोचक व प्रभावशाली हो या जो स्तम्भों की व्यवस्था में इतनी सुन्दरता व्यक्त करता हो।”
ii) नेमिनाथ का जैन मंदिर –
चौमुखा मंदिर के समीप नेमिनाथजी का मंदिर स्थित है। इस मंदिर की दीवारों पर नग्न और संभोग करते – हुए युगलों की मूर्तियाँ उत्कीर्ण हैं, इसलिए इस मंदिर को ‘पातरियाँ रो देहरो’ (वेश्याओं का मंदिर) कहते हैं।
(iii) पार्श्वनाथ जैन मंदिर – पार्श्वनाथजी का मंदिर नेमिनाथजी के मंदिर के साथ में ही है।
(iv) सूर्य नारायण का मंदिर – सूर्य नारायण का मंदिर पार्श्वनाथ मंदिर से थोड़ी दूरी पर बना हुआ है।
श्री महावीरजी जैन मंदिर (करौली)
गंभीरी नदी के किनारे करौली जिले के हिण्डौन सिटी में स्थित श्रीमहावीरजी विश्वविख्यात जैन समुदाय का सबसे बड़ा लोकतीर्थ है। चैत्र शुक्ल त्रयोदशी को महावरी जयंती पर यहाँ चार दिन का विशाल मेला लगता है। यहाँ दिगम्बर व श्वेताम्बर धाराओं के मंदिर हैं। मेले में जिनेन्द्र रथयात्रा निकाली जाती है। हिण्डौन सिटी का प्राचीन नाम चांदनपुर था, जिस कारण महावीर जी को चांदनपुर के महावीर कहा जाता है, तो वहीं मंदिर का निर्माण जैन श्रावक अमरचंद बिलाला के द्वारा करवाया गया था।
मूँछाला महावीर, घाणेराव (पाली)
मंदिर में स्थित महावीर स्वामी की मूर्ति की विशेषता यह है कि मूर्ति के मुख पर मूँछे हैं। मारवाड़ में इन्हें जीवंत स्वामी कहते हैं। इस मंदिर का निर्माण 10वीं सदी में हुआ।
आहड़ के जैन मंदिर (उदयपुर)
यहाँ 10वीं शताब्दी में निर्मित जैन मंदिरों का समूह है, जहाँ आचार्य जगच्चंद सूरि को 12 वर्षों के कठोर तपोरांत तत्कालीन शासक रावल जैत्रसिंह ने ‘तपा’ का विरुद्ध प्रदान किया था। परिणामस्वरूप जगच्चन्द सूरि की शिष्य परम्परा ‘तपागच्छ’ के नाम से प्रसिद्ध हुई। यह स्थान तपागच्छ की उद्भव स्थली के रूप में जाना जाता है।
त्रिकाल चौबीसी जैन मंदिर (हाड़ौती)
इस जैन मंदिर को त्रिकाल चौबीसी मंदिर इसलिए कहते हैं, क्योंकि इस मंदिर में जैनियों के तीनों कालों के 72 तीर्थंकरों की प्रतिमाएँ विराजित है। यह मंदिर राज्य का दूसरा व हाड़ौती प्रदेश का प्रथम मंदिर है। संपूर्ण भारत देश में इस प्रकार के लगभग 10 मंदिर हैं और राज्य का दूसरा त्रिकाल चौबीसी मंदिर उदयपुर क्षेत्र में स्थित है।
श्रृंगार चंवरी (चित्तौड़गढ़)
चित्तौड़गढ़ दुर्ग में राजपूत व जैन स्थापत्य कला के समन्वय का एक उत्कृष्ट नमूना है जो ‘श्रृंगार चंवरी’ के नाम से प्रसिद्ध है। उल्लेखनीय है कि यह महाराणा कुम्भा की पुत्री रमाबाई की शादी की चंवरी थी जिसे बाद में शांतिनाथ जैन मंदिर बना दिया गया, तो वहीं इस चंवरी का निर्माण 1448 ई. में वेलका ने करवाया था।
फालना का जैन मंदिर (पाली)
बेजोड़ स्थापत्य कला पर सैंकड़ों किलोग्राम सोने का श्रृंगार केवल पाली जिले के फालना में ही देखने को मिलता है। इसी कारण फालना के इस मंदिर को ‘मिनी मुंबई’ व ‘गेटवे ऑफ गोल्डन’ के नाम से भी जाना जाता है। यह मंदिर त्रिशिखरी हैं जो प्रसिद्ध जैनतीर्थ रणकपुर और देलवाड़ा मंदिरों की तर्ज पर बना हुआ है। मंदिर का निर्माण 1913 ई. में करवाया गया तथा मूर्तियों की प्रतिष्ठा भट्टारक आचार्य मुनिचन्द्र सूरीश्वर ने की थी।
धातव्य रहे- सांडेराव का शांतिनाथ जिनालय (पाली) का निर्माण पाण्डव वंशधर गंधर्वसेन ने करवाया, राटा महावीर जैन मंदिर (पाली) की तुलना रणकपुर जैन मंदिर से की जाती है, सिरियारी जैन तीर्थ (पाली) में तेरापंथ के प्रथम आचार्य श्री भिक्षु की समाधि स्थित है, तो वहीं वरकाना जैन मंदिर (पाली) जैन धर्म – के 23वें तीर्थंकर पार्श्वनाथ का मंदिर है।’
भांडाशाह जैन मंदिर/घी वाला मंदिर
बीकानेर नगर की स्थापना से 24 वर्ष पूर्व बने भांडाशाह जैन मंदिर को सुमति नाथ मंदिर के नाम से भी जाना जाता है। जैन धर्म के पाँचवें तीर्थंकर सुमतिनाथ का यह मंदिर घी वाले मंदिर के नाम से भी जाना जाता है। तीन मंजिला इस मंदिर का निर्माण गंगा शहर भीनासर के घी के व्यवसायी भांडाशाह ओसवाल द्वारा संवत 1488 में करवाया गया था। इस मंदिर को ‘त्रिलोक दीपक प्रसाद’ भी कहा जाता है।
चमत्कार जी जैन मंदिर (सवाई माधोपुर)
सवाई माधोपुर शहर में श्री चमत्कारजी का मंदिर स्थित है। इस मंदिर में स्फटिक पाषाण की बनी भगवान ऋषभदेव की प्रतिमा प्रतिष्ठापित है। मंदिर की व्यवस्था श्री दिगम्बर जैन अतिशय क्षेत्र कमेटी चमत्कार जी द्वारा संचालित है। इस स्थान पर प्रतिवर्ष शरद पूर्णिमा को मेला भरता है।
कालिंजरा के जैन मंदिर (बांसवाड़ा)
यह बाँसवाड़ा में हिरण नदी के किनारे पर बसे जैन मंदिर है। इन मंदिरों में पार्श्वनाथ जैन मंदिर में भगवान पार्श्वनाथ की खड़ी मुद्रा है जिसके नीचे वि.सं. 1578 लिखा है तथा ऋषभदेव जैन मंदिर जैन धर्म के प्रथम तीर्थंकर आदिनाथ/ऋषभदेव को समर्पित दिगम्बर मंदिर है।
तिजारा जैन मंदिर (अलवर)
यहाँ 8वें जैन तीर्थंकर चन्द्रप्रभु का मंदिर है, तो वहीं माना जाता है कि यह मूर्ति देहरा गाँव से प्राप्त हुई थी।
नीलकण्ठ जैन मंदिर (अलवर)
यह जैन तीर्थंकर पार्श्वनाथ का मंदिर है, जिसका निर्माण कन्नौज शासक महिपालदेव के समय शिल्पी सर्पदेव ने किया, तो वहीं इस मंदिर की भूमि मंथनदेव ने दान में दी थी।
सतबीस देवरी (चित्तौड़गढ़)
यह मंदिर चित्तौड़गढ़ दुर्ग में स्थित हैं, जहाँ छोटी-छोटी 27 ‘देवरियाँ है। यह जैन मंदिर है जिसका निर्माण 11वीं सदी में हुआ, तो वहीं इस मंदिर का शिल्प देलवाड़ा जैन मंदिर से मिलता-जुलता है।
चूलगिरी जैन मंदिर (जयपुर)
यह मंदिर जैन धर्म के 23वें तीर्थंकर पार्श्वनाथ का मंदिर है।
पद्मप्रभु मंदिर (पदमपुरा, जयपुर),
यह दिगम्बर धारा का जैन मंदिर है। माना जाता है कि भगवान पदमप्रभु की मूर्ति भूमि से प्रकट हुई थी।
पार्श्वनाथ मंदिर (लोदवा, जैसलमेर)
यहाँ जैन धर्म 23वें तीर्थंकर पार्श्वनाथ की सहस्त्रपर्णी मूर्ति है, जिसकी स्थापना 1263 ई. में आचार्य श्री जिनपति सूरि द्वारा की गई थी।
ध्यातव्य रहे – शांतिनाथ जैन मंदिर (झालावाड़), चाँदखेड़ी का जैन मंदिर, चाँदखेड़ी, नागेश्वर पार्श्वनाथ मंदिर (झालावाड़), भीनमाल (जालौर) का जैन मंदिर (यह देश का सबसे बड़ा जैन मंदिर है, जो 14 फरवरी, 2011 को बनकर तैयार हुआ था।)।
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भारत का एकमात्र सिंह पर सवार गणेश मंदिर ‘हेरांभ गणपति मंदिर’ (बीकानेर) में है, तो राजस्थान का एकमात्र विभीषण मंदिर ‘कैथून’ (कोटा) में है।
भारत का एकमात्र त्रिनेत्र गणेश मंदिर ‘रणथंभौर’ (सवाई माधोपुर), राजस्थान का एकमात्र नृत्यरत गणेश मंदिर ‘सरिस्का’ (अलवर), भारत का एकमात्र ‘बाजणा गणेश’ मंदिर माउण्ट आबू (सिरोही), राजस्थान का एकमात्र खड़े गणेश जी का मंदिर कोटा, राजस्थान का एकमात्र लक्ष्मण मंदिर ‘भरतपुर’ में है, तो राजस्थान का एकमात्र ‘रावण मंदिर’ मण्डौर (जोधपुर) में है।
भगवान सूर्य के जूते पहने मूर्ति वाला एकमात्र मंदिर ‘सात सहेली मंदिर’ झालरापाटन (झालावाड़), दाढ़ी मूँछ वाले हनुमान जी का एकमात्र मंदिर ‘सालासर’ (चूरू) में है, तो ताजमहल के समकक्ष मंदिर (कर्नल टॉड के अनुसार) ‘विमलवसही/आदिनाथ मंदिर’ दिलवाड़ा (सिरोही) है।
राजस्थान का सर्वाधिक धनी मंदिर ‘साँवलिया सेठ का मंदिर’ है, तो चौबीस मंदिरों की नगरी ‘औसियाँ’ (जोधपुर) में है।
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- 8. श्वसन तंत्र / Respiratory System
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- 4. Nervous Tissue / तंत्रिका ऊतक
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