उत्प्रेरक

उत्प्रेरक

वे पदार्थ जो रासायनिक अभिक्रिया के वेग को परिवर्तित कर देता है। परन्तु स्वयं अपरिवर्तित रहता है। उत्प्रेरक कहलाते है।
 
– उत्प्ररक कि खोज सर्वप्रथम बर्जीलियस नामक वैज्ञानिक ने कि थी।
 
– इन्होने जब पोटेशियम क्लोरेट का अपघटन कराया तो यह 600°C पर अपघटित होता है। और जब इसका अपघटन मैंगनीज डाई ऑक्साइड की उपस्थिति में कराया जाता है। तो यह 300°C ताप पर अपघटित हो जाता है।
 
2KCIO3 → 2KCI + 3O2 (600°C ताप पर)
 
2KCIO3 → 2KCl + 3O2 (MnO2 की उपस्थिति एवं 300° C ताप पर)

उत्प्रेरक के गुण

1. उत्प्रेरक केवल रासायनिक अभिक्रिया के वेग में परिवर्तन के लिए उत्तरदायी होते है। उनके स्वयं के रासायनिक संघटन एवं मात्रा में कोई परिवर्तन नहीं होता है।
 
2. अभिक्रिया मिश्रण में उत्प्रेरक की सूक्ष्म मात्रा में उपस्थिति ही पर्याप्त होती है।
 
3. प्रत्येक अभिक्रिया के लिए एक विशिष्ट उत्प्रेरक होता है। अर्थात एक ही उत्प्रेरक सभी अभिक्रियाओं को उत्प्ररित नहीं कर सकता है।
 
4. उत्प्रेरक अभिक्रिया को आरम्भ नहीं करता है। केवल उसके वेग को परिवर्तित करता है।
 
5. उत्क्रमणीय अभिक्रियाओं में उत्प्रेरक अग्र व प्रतीप दोनों अभिक्रियाओं के वेग को समान रूप से प्रभावित करता है।
 
6. उत्प्रेरक एक निश्चित ताप पर ही अत्यधिक क्रियाशील होते है। ताप बदलने पर इनकी क्रियाशीलता प्रभावित होती है।
 

उत्प्रेरक के प्रकार 

भौतिक अवस्था के आधार पर :-

(अ) समांगी उत्प्रेरक :-

जल रासायनक अभिक्रिया में अभिकारक, उत्पाद एवं उत्प्रेरक तीनों समान भौतिक अवस्था में होते है। तो उत्प्रेरक समांगी उत्प्रेरक कहलाते है।
 
CH3COOCH3 (l) + H2O (l) → CH3COOH(aq) + CH3OH (aq)
 
2SO2(g) + O2(g) → 2SO3(g)
 

(ब) विषमांगी उत्प्रेरक :- 

जब रासायनिक अभिक्रियाओं में अभिकारक, उत्पाद एवं उत्प्रेरक की भौतिक अवस्था भिन्न-भिन्न होती है। तो इस प्रकार के उत्प्रेरक को विषमांगी उत्प्रेरक कहते है।
 

(क) हैबर विधि द्वारा अमोनिया का निर्माण :-

$$N_2 + 3H_2 \overset{Fe(Mo)}{\rightarrow} 2NH_3$$

(ख) हाइड्रोजनीकरण :-

वनस्पति तेल (l) + H2(g) →  वनस्पति घी (s)
 

क्रिया के आधार पर उत्प्रेरक के प्रकार

1. धनात्मक उत्प्रेरक :- 

वे उत्प्रेरक जो रासायनिक अभिक्रिया के वेग को बढ़ा देते है। धनात्मक उत्प्रेरक कहलाते है।
 
उदाहरण :-
 
2KCIO3 → 2KCl + 3O2 (MnO2 की उपस्थिति में)
 
2SO2 + O→ 2SO3 (NO की उपस्थिति में)
 

2. ऋणात्मक उत्प्रेरक :- 

वे उत्प्रेरक जो रासायनिक अभिक्रिया के वेग को घटा देते है। ऋणात्मक उत्प्रेरक कहलाते है। उदाहरण :-
 
(अ) ग्लिसरॉल की उपस्थिति में H2O2 के अपघटन की दर कम हो जाती है। अतः हाइड्रोजन परॉक्साइड का संग्रहण करने के लिए इसमें सूक्ष्म मात्रा में ग्लिसरॉल मिला देते है।
 
(ब) क्लोरॉफार्म वायु में ऑक्सीजन से क्रिया करके स्वतः ऑक्सीकृत होकर विषैली गैस फॉस्जीन बनाती है। इस अभिक्रिया की गति को मंद करने के लिए इसमें थोड़ी मात्रा में एथेनॉल मिला दिया जाता है।
 

3. स्वतः उत्प्रेरक :- 

जब किसी रासायनिक अभिक्रिया में बना उत्पाद ही उत्प्रेरक का कार्य करता है। स्वतः उत्प्रेरक कहलाता है। उदाहरण :- प्रारम्भ में एथिल एसीटेट का जल अपघटन मंद गति से होता है। लेकिन कुद मात्रा में एसीटिक अम्ल उत्पाद के रूप में बनने के बाद अभिक्रिया का वेग बढ़ जाता है।
 

4. प्रेरित उत्प्रेरक :- 

कुछ अभिक्रियाओं में एक अभिक्रिया का वेग उसके साथ होने वाली द्वितीय अभिक्रिया के प्रेरण से तीव्र हो जाता है। इस स्थिति में अभिक्रिया प्रेरित उत्प्रेरक कहलाती है।
 
उदाहरण :- सोडियम सल्फाइट का वायु में तीव्र गति से ऑक्सीकरण होता है। सोडियम आर्सेनाट का ऑक्सीकरण नहीं होता है। यदि दोनों पदार्थों को साथ मिला दिया जाये तो दोनों वायु के द्वारा ऑक्सीकृत हो जाते है।
 

5. जैव उत्प्रेरक :- 

जैव रासायनिक अभिक्रिया की दर को बढ़ाने वाले उत्प्रेरक को जैव उत्प्रेरक कहते है। इन्हें एन्जाइम भी कहते है। जैसे टायलीन नामक एन्जाइम स्टार्च को माल्टोज में बदलता है।
 

एन्जाइम उत्प्रेरकों के गुण:-

1. सर्वाधिक प्रभावी –  एन्जाम की उपस्थिति में कोई अभिक्रिया 10 लाख गुना तीव्र गति से हो सकती है।
 
2. सूक्ष्म मात्रा – अत्यन्त सूक्ष्म मात्रा में लिया गया एन्जाइम भी अभिक्रिया के वेग को 10 से 100 गुना बढ़ा देता है।
 
3. विशिष्टता एन्जाइम – अत्यन्त विशिष्ट प्रकृति के होते है, एक  एन्जाइम एक अभिक्रिया में उत्प्रेरक का कार्य कर सकता है।
 
4. ताप एवं pH – एन्जाइम की सक्रियता मध्यम ताप 37 और निश्चित pH मान (लगभग 7) पर ही रहती है।
 
5. कोलाइडी प्रकृति :- एन्जाइम कोलाइढ प्रकृति के होते है। जिन्हे विद्युत अपघट्य मिलाने पर स्कन्दन द्वारा नष्ट किया जा सकता है।
 
6. वर्द्धक या सह एन्जाइम :-  धातु आयन उदाहरण Na”, Mn², Co², Cu, Fe, Zn² आदि एन्जाइम अणुओं के साथ दुर्बल बंधों का निर्माण कर इनकी उत्प्रेरकीय सक्रियता को बढ़ा देते है। अतः ये धातु आयन सह एन्जाइम कहलाते है।
 
7. विष एन्जाइम :- HCN, CS, आदि पदार्थ एन्जाइमों के लिए विष का कार्य करते है। तथा ये पैराबैंगनी विकिरणों से नष्ट हो जाते है।
 
एन्जाइम उत्प्रेरित अभिक्रिया की क्रिया विधि का ताला चाबी सिद्धान्त :-
 
1. सर्वप्रथम एन्जाइम क्रियाकारक के अणु से जुडकर एन्जाइम क्रियाकारक संकुल का निर्माण करता है।
 
2. संकुल संरचना में उत्पाद का निर्माण होना।
 
3. एन्जाइम उत्पाद संकुल से उत्पाद का अलग होना।
 
6. जिओलाइट उत्प्रेरक या आकार वरणात्मक उत्प्रेरक :-
 
जिओलाइट सूक्ष्म छिद्रित एल्यूमिनो सिलिकेट होते है। इनका सामान्य सूत्र होता है। जिओलाइट की त्रिवमिय संरचना में कुछ सिलिकन परमाणु के स्थान पर AI परमाणु आ जाते है। इस प्रकार के उत्प्रेरक में विभिन्न आकार के छिद्र तथा गुहाएँ होती है। जिनका आकार 260 Pm से 740 Pm तक होता है। जिओलाइट के इन छिद्रों में जल अणु भर जाते है। तब इन्हें जल योजित जियोलाइट कहते है।
 
इनका उपयोग आयन विनिमय द्वारा कठोर जल को मृदु बनानें में करते है।
 
रासायनिक अभिक्रियाओं में उत्प्रेरक की क्रियाशीलता को प्रभावित करने वाले कुछ पदार्थों का प्रयोग भी किया जाता है।
 
1. उत्प्रेरक वर्धक :- वे पदार्थ जिन्हे अभिक्रिया मिश्रण में उत्प्रेरक के साथ मिलाने पर उत्प्रेरक की क्रियाशीलता में वृद्धि हो जाती है। उत्प्रेरक वर्धक कहलाते है। ये केवल उत्प्रेरक की क्रियाशीलता को बढ़ाते है स्वंय उत्प्रेरक नहीं होते है।
 
उदाहरण हैबर विधि में मोलिब्डेनम चूर्ण आयरन उत्प्रेरक की क्रियाशीलता को बढ़ाकर अभिक्रिया के वेग में वृद्धि कर देते है।
 
2. उत्प्रेरक विष : वे पदार्थ जिन्हे अभिक्रिया मिश्रण में मिलाने पर उत्प्रेरक की क्रियाशीलता कम हो जाती है, उत्प्रेरक विष कहलाते है।
 
उदाहरण :- हैबर विधि में कार्बनमोनो ऑक्साइड गैस मिला दी जाए तो आयरन उत्प्रेरक की क्रिया में कमी आ जाती है।

 Questions 

1. अभिक्रिया के वेग को परिवर्तित करने वाले पदार्थ होते है –

(अ) उत्प्रेरक
(ब) ऑक्सीकारक
(स) अपचायक
(द) कोई नही।
 
सही विकल्प (अ) उत्प्रेरक (Catalyst) है।

विस्तृत व्याख्या (Core Concept)

  1. परिभाषा: वे बाहरी पदार्थ जो किसी रासायनिक अभिक्रिया के वेग (Speed) को कम या अधिक कर देते हैं, परन्तु स्वयं अभिक्रिया के अंत में रासायनिक

    1. रूप से अपरिवर्तित रहते हैं, उत्प्रेरक कहलाते हैं। इस पूरी घटना को उत्प्रेरण (Catalysis) कहते हैं।

    2. कार्य करने का तरीका: उत्प्रेरक अभिक्रिया की सक्रियण ऊर्जा (Activation Energy) को कम कर देते हैं, जिससे अभिकारक अणु जल्दी से उत्पादों में बदल जाते हैं।

    3. उत्प्रेरक के प्रकार:

      • धनात्मक उत्प्रेरक: जो अभिक्रिया की गति को बढ़ाते हैं।

      • ऋणात्मक उत्प्रेरक: जो अभिक्रिया की गति को कम करते हैं।

      • जैव उत्प्रेरक (Enzymes): जो जीवित कोशिकाओं के अंदर होने वाली जैव-रासायनिक अभिक्रियाओं को प्रेरित करते हैं (जैसे पेप्सिन, टायलिन)।

 

2. वह अभिक्रिया जो बनने वाले उत्पाद से ही उत्प्रेरित हो जाती है कहलाती है ?

(अ) जैव रासायनिक
(ब) उत्क्रमणीय
(स) स्वतः उत्प्रेरित
(द) अनुत्क्रमणीय

सही उत्तर (स) स्वतः उत्प्रेरित (Auto-catalytic) है।

स्वतः उत्प्रेरण (Auto-catalysis) क्या है?

जब किसी रासायनिक अभिक्रिया में बना कोई उत्पाद (Product) स्वयं ही उस अभिक्रिया के लिए उत्प्रेरक (Catalyst) का कार्य करने लगता है, तो इसे ‘स्वतः उत्प्रेरण’ कहते हैं।

  • प्रक्रिया: शुरुआत में ऐसी अभिक्रियाओं की गति बहुत धीमी होती है, लेकिन जैसे-जैसे उत्पाद बनना शुरू होता है, अभिक्रिया की गति तेजी से बढ़ने लगती है।


प्रमुख उदाहरण:

ऑक्सालिक अम्ल का पोटैशियम परमैंगनेट द्वारा ऑक्सीकरण:

जब अम्लीय $KMnO_4$ के विलयन में ऑक्सालिक अम्ल मिलाया जाता है, तो शुरू में बैंगनी रंग बहुत धीरे-धीरे गायब होता है। लेकिन अभिक्रिया में जैसे ही $Mn^{2+}$ (मैंगनीज आयन) बनते हैं, वे उत्प्रेरक का काम करते हैं और अभिक्रिया बहुत तेज हो जाती है।


अन्य विकल्पों का संक्षिप्त परिचय:

  • (अ) जैव रासायनिक: जीवों के शरीर में होने वाली अभिक्रियाएँ (जैसे पाचन), जिनमें ‘एंजाइम’ उत्प्रेरक होते हैं।

  • (ब) उत्क्रमणीय (Reversible): वे अभिक्रियाएँ जो दोनों दिशाओं (अग्र और पश्च) में चल सकती हैं।

  • (द) अनुत्क्रमणीय (Irreversible): वे अभिक्रियाएँ जो केवल एक ही दिशा में संपन्न होती हैं।

 

3. एन्जाइम है एक –

(अ) अम्ल
(ब) पाचक
(स) उत्प्रेरक
(द) हार्मोन
 
सही उत्तर (स) उत्प्रेरक है।

विस्तृत व्याख्या:

  • जैव-उत्प्रेरक (Bio-catalyst): एन्जाइम वे पदार्थ हैं जो जीवित कोशिकाओं के भीतर होने वाली जटिल रासायनिक अभिक्रियाओं (जैसे पाचन, श्वसन) की गति को बढ़ाते हैं। बिना एन्जाइम के हमारे शरीर की क्रियाएं इतनी धीमी हो जाएंगी कि जीवन संभव नहीं होगा।

  • प्रकृति: लगभग सभी एन्जाइम प्रोटीन के बने होते हैं।

  • क्रियाविधि: ये ‘ताला-चाबी’ (Lock and Key) सिद्धांत पर कार्य करते हैं, जहाँ एक विशेष एन्जाइम केवल एक विशेष पदार्थ (Substrate) पर ही क्रिया करता है।


अन्य विकल्पों का विश्लेषण:

  • (अ) अम्ल: एन्जाइम स्वयं अम्ल नहीं होते, हालांकि कुछ अम्लीय वातावरण में सक्रिय होते हैं।

  • (ब) पाचक: यद्यपि कई एन्जाइम भोजन पचाने में मदद करते हैं (जैसे एमाइलेज, पेप्सिन), लेकिन सभी एन्जाइम केवल पाचन के लिए नहीं होते। कुछ DNA बनाने या ऊर्जा उत्पादन में भी सहायक होते हैं।

  • (द) हार्मोन: हार्मोन शरीर के रासायनिक संदेशवाहक होते हैं जो ग्रंथियों से निकलते हैं, जबकि एन्जाइम उत्प्रेरक के रूप में रासायनिक क्रियाओं को गति देते हैं।

4. वर्द्धक कार्य करता है।

(अ) उत्प्रेरक की पृष्ठ ऊर्जा बढ़ाकर
(ब) उत्प्रेरक की सतह अधिक सक्षम बनाकर
(स) उत्प्रेरक की सतह को अधिक चिकनी बनाकर
(द) इनमें से कोई नही
 

सही उत्तर (ब) उत्प्रेरक की सतह अधिक सक्षम बनाकर है।

उत्प्रेरक वर्द्धक (Catalytic Promoter) क्या है?

वर्द्धक वे पदार्थ होते हैं जो स्वयं तो उत्प्रेरक नहीं होते, लेकिन यदि उन्हें उत्प्रेरक के साथ मिला दिया जाए, तो वे उत्प्रेरक की कार्यक्षमता (Activity) को बढ़ा देते हैं।

यह कार्य कैसे करता है?

वर्द्धक मुख्य रूप से निम्नलिखित तरीकों से उत्प्रेरक की सतह को अधिक प्रभावी बनाते हैं:

  • सक्रिय केंद्रों की संख्या बढ़ाना: ये उत्प्रेरक की सतह पर ‘सक्रिय केंद्रों’ (Active Centers) की संख्या में वृद्धि कर देते हैं, जिससे अभिकारक के अणु अधिक प्रभावी ढंग से जुड़ पाते हैं।

  • खुरदरापन बढ़ाना: ये उत्प्रेरक की सतह को अधिक असमान (Rough) बना देते हैं। जितनी अधिक सतह खुरदरी होगी, उतने ही अधिक अभिकारक के अणु वहाँ अभिक्रिया कर सकेंगे।


प्रमुख उदाहरण:

हैबर विधि (Haber’s Process): अमोनिया बनाने की इस विधि में लोहा (Fe) उत्प्रेरक होता है, जबकि मोलिब्डेनम (Mo) वर्द्धक का कार्य करता है। मोलिब्डेनम लोहे की सतह को अधिक सक्षम बनाता है जिससे अमोनिया तेजी से बनती है।

$$N_2 + 3H_2 \overset{Fe(Mo)}{\rightarrow} 2NH_3$$

अन्य विकल्पों का विश्लेषण:

  • (अ) पृष्ठ ऊर्जा: ऊर्जा बढ़ाना मुख्य उद्देश्य नहीं होता, बल्कि भौतिक रूप से सतह की संरचना में सुधार करना होता है।

  • (स) सतह को चिकनी बनाना: यह गलत है। यदि सतह चिकनी हो जाएगी, तो सक्रिय केंद्र कम हो जाएंगे और उत्प्रेरक की क्षमता घट जाएगी।

 

 

5. किसी रासायनिक अभिक्रिया में धन उत्प्रेरक की भूमिका क्या है ?

(अ) अभिक्रिया की दर को बढ़ाता है
(ब) अभिक्रिया की दर को कम करता है।
(स) उत्पाद की लब्धि को बढ़ाता है।
(द) यह उत्पाद की बेहतर शुद्धता प्रदान करता है।
 

सही उत्तर (अ) अभिक्रिया की दर को बढ़ाता है है।

धन उत्प्रेरक (Positive Catalyst) की भूमिका:

धन उत्प्रेरक वे पदार्थ होते हैं जो किसी रासायनिक अभिक्रिया की गति या दर (Rate of reaction) को बढ़ा देते हैं। इनकी कार्यप्रणाली के मुख्य बिंदु इस प्रकार हैं:

  • सक्रियण ऊर्जा को कम करना: ये अभिक्रिया के लिए एक वैकल्पिक मार्ग प्रदान करते हैं जिसकी सक्रियण ऊर्जा (Activation Energy) कम होती है। इससे कम ऊर्जा पर भी अधिक अभिकारक अणु उत्पादों में बदल पाते हैं।

  • स्वयं अपरिवर्तित रहना: अभिक्रिया के अंत में उत्प्रेरक के द्रव्यमान और रासायनिक संगठन में कोई परिवर्तन नहीं होता।

  • उदाहरण: पोटैशियम क्लोरेट (KClO3) के तापीय अपघटन में मैंगनीज डाइऑक्साइड (MnO2) एक धन उत्प्रेरक है, जो ऑक्सीजन बनने की गति को तेज कर देता है।


अन्य विकल्पों का विश्लेषण:

  • (ब) अभिक्रिया की दर को कम करना: यह कार्य ऋण उत्प्रेरक (Negative Catalyst) या निरोधक का होता है।

  • (स) उत्पाद की लब्धि (Yield) बढ़ाना: उत्प्रेरक केवल अभिक्रिया को तेज करता है, वह उत्पाद की मात्रा (Yield) को नहीं बढ़ाता। उत्पाद की मात्रा अभिकारकों की मात्रा पर निर्भर करती है।

  • (द) शुद्धता: शुद्धता का उत्प्रेरक से सीधा संबंध नहीं होता; यह पृथक्करण की विधियों पर निर्भर करती है।

 

 

6. एक उत्प्रेरक वह है जो –

(अ) अभिक्रिया के साम्य को बदलता रहता है।
(ब) अभिक्रिया में भाग नही लेता लेकिन इसकी गति को बढ़ा देता है।
(स) अभिक्रिया में भाग लेता है और इसके लिए एक सरल मार्ग प्रदान करता है।
(द) अभिक्रियाकारक की सतह समान अवस्था में रखता है।
 

सही उत्तर (स) अभिक्रिया में भाग लेता है और इसके लिए एक सरल मार्ग प्रदान करता है। है।

यह प्रश्न उत्प्रेरक की कार्यप्रणाली के सूक्ष्म वैज्ञानिक आधार पर केंद्रित है। आइए इसकी विस्तृत व्याख्या समझते हैं:

सही विकल्प (स) क्यों है?

एक पुरानी धारणा यह थी कि उत्प्रेरक अभिक्रिया में भाग नहीं लेते, लेकिन आधुनिक विज्ञान (जैसे मध्यवर्ती यौगिक सिद्धांत) के अनुसार:

  • सक्रिय भाग लेना: उत्प्रेरक वास्तव में अभिकारकों के साथ क्रिया करके एक अस्थाई ‘मध्यवर्ती यौगिक’ (Intermediate complex) बनाता है।

  • सक्रियण ऊर्जा (Activation Energy) कम करना: यह अभिक्रिया के लिए एक ऐसा वैकल्पिक मार्ग (Alternative path) प्रदान करता है जिसकी सक्रियण ऊर्जा बहुत कम होती है।

  • सरल मार्ग: कम ऊर्जा वाले इस मार्ग से होकर अभिकारक के अणु बहुत आसानी से और तेजी से उत्पाद में बदल जाते हैं।

  • पुनर्प्राप्ति: अभिक्रिया के अंत में, उत्प्रेरक स्वयं को उत्पादों से अलग कर लेता है और मूल रूप में वापस मिल जाता है।


अन्य विकल्पों का विश्लेषण:

  • (अ) अभिक्रिया के साम्य (Equilibrium) को बदलना: उत्प्रेरक कभी भी साम्य की स्थिति को नहीं बदलता। यह केवल साम्य तक पहुँचने के समय को कम करता है (अग्र और पश्च दोनों अभिक्रियाओं को समान रूप से बढ़ाकर)।

  • (ब) अभिक्रिया में भाग नहीं लेता: यह पूर्णतः सही नहीं है। वह रासायनिक रूप से खर्च नहीं होता, लेकिन अभिक्रिया के दौरान भौतिक या मध्यवर्ती रूप में भाग अवश्य लेता है।

  • (द) सतह समान रखना: यह उत्प्रेरक की परिभाषा का मुख्य हिस्सा नहीं है।


निष्कर्ष:

उत्प्रेरक एक ऐसा “स्मार्ट एजेंट” है जो खुद तो खर्च नहीं होता, लेकिन अभिक्रिया को एक कम ऊर्जा वाला छोटा रास्ता दिखाकर उसे जल्दी संपन्न करवा देता है।

 
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