बंगाल की खाड़ी का अपवाह तन्त्र
1. बाणगंगा नदी –
बाणगंगा नदी ऐसी दूसरी नदी (पहली चम्बल) है, जो अपना जल सीधा यमुना नदी में डालती है। इस नदी की कुल लम्बाई 240 किमी. (पूर्व में 380 किमी.) है, जिसके किनारे प्राचीन कालीन सभ्यता स्थल ‘बैराठ’ (जयपुर) अवस्थित है। अर्जुन की गंगा, ताला नदी व रूण्डित नदी के उपनाम से विख्यात बाणगंगा नदी का उद्गम जयपुर जिले में स्थित ‘बैराठ की पहाड़ियों’ से होता है। बाणगंगा नदी जयपुर (जयपुर में इसी नदी के किनारे जमवारामगढ़ बाँध (रामसिंह द्वितीय 1903 ई.) बनाया गया, जिससे प्राचीन काल में जयपुर को पेयजल व्यवस्था की जाती थी, लेकिन वर्तमान में जयपुर जिले पेयजल व्यवस्था बीसलपुर बाँध (टोंक) से की जाती है) व दौसा जिले में प्रवाहित होती हुई ‘वैर’ नामक स्थान से भरतपुर जिले में प्रवेश करती है। भरतपुर जिले में इस नदी पर ‘अजान बांध’ का निर्माण कराया गया है। अजान बांध से ‘घना पक्षी अभयारण्य’ (भरतपुर) को जलापूर्ति होती है। भरतपुर जिले से बाहर निकलकर यह नदी उत्तर प्रदेश में आगरा के ‘फतेहाबाद’ नामक स्थान पर यमुना नदी में मिल जाती है।
2. चम्बल –
चम्बल नदी का प्राचीन नाम चर्मणवती है, जिसे राजस्थान की कामधेनु भी कहा जाता है। यह राजस्थान की बारहमासी एवं नित्यवाही नदी है, जो राजस्थान की सबसे लम्बी नदी है जिसकी कुल लम्बाई 1051 किमी. [320 किमी. मध्य प्रदेश में, 322 किमी. राजस्थान में, 252 किमी. अंतर्राज्यीय बार्डर, 157 किमी. उत्तर प्रदेश] (पूर्व में चम्बल की लम्बाई 965/66 किमी.) है। चम्बल नदी राजस्थान की एक मात्र ऐसी नदी है, जो अंतर्राज्यीय सीमा बनाती है एवं जिसके 100 किमी. के प्रवाह क्षेत्र में तीन बाँध (गाँधीसागर बाँध-मध्यप्रदेश, राणा प्रताप सागर बाँध चित्तौड़गढ़ एवं जवाहर सागर बाँध-कोटा) ऐसे बने हुए है जहाँ जल विद्युत पैदा होती है। इस नदी का प्रवाह क्षेत्र वृक्षाकार है जहाँ पर सर्वाधिक मगरमच्छ एवं घड़ियाल पाए जाते हैं, इसी कारण इस नदी को घड़ियालों की प्रजनन स्थली कहते हैं। यूनेस्को की विश्व धरोहर के लिए नामांकित यह एकमात्र नदी है। चम्बल नदी अपने बहाव क्षेत्र में अवनालिका अपरदन के माध्यम से गहरे गहरे गढ्ढे बना देती है जिन्हें ‘बीहड़’ कहा जाता है। राजस्थान में सर्वाधिक बीहड़ करौली, धौलपुर एवं सवाईमाधोपुर जिले में है।
चम्बल नदी का उद्गम मध्य प्रदेश के ‘इन्दौर’ जिले के ‘महू’ के निकट विंध्याचल पर्वत में स्थित 616 मीटर ऊँची ‘जानापाव की पहाड़ियाँ’ (मानपुर, महू) से होता है। यहाँ से यह नदी निकलकर मध्यप्रदेश के मंदसौर जिले में मानपुरा एवं भानपुरा पठारों के मध्य (इस नदी का सबसे बड़ा बाँध गाँधी सागर बाँध यहीं बना हुआ है) बहते हुए राजस्थान के चित्तौड़गढ़ जिले के भैंसरोड़गढ़ तहसील के नजदीक ‘चौरासीगढ़’ नामक स्थान से राज्य में प्रवेश करती है। भैंसरोड़गढ़ से 5 किमी. आगे 18 मीटर ऊँचा चूलिया जल प्रपात बनाती है, जो राजस्थान का सबसे ऊँचा व देश का पाँचवें नम्बर का जल प्रपात है। यहाँ से यह नदी चित्तौड़गढ़ (इस नदी के किनारे चित्तौड़गढ़ के रावत भाटा नामक स्थान पर राणा प्रताप सागर बाँध बना हुआ है, जो राजस्थान का सर्वाधिक भराव क्षमता वाला बाँध है), कोटा (इस नदी के किनारे कोटा के बोरावास नामक स्थान पर जवाहर सागर बाँध बना हुआ है, जो एक पिकअप बाँध (जल का कृत्रिम उत्थान) एवं कोटा शहर के नजदीक कोटा बैराज बाँध बना हुआ है, जिसका सर्वाधिक केचमेंट एरिया (जल अधिग्रहण क्षेत्र) है। सवाईमाधोपुर, करौली, धौलपुर होते हुए अन्त में उत्तर प्रदेश के इटावा के मुरादगंज नामक स्थान पर ‘यमुना’ में मिल जाती है।
ध्यान रहे-चम्बल नदी में ‘गांगेय-सूस’ नामक एक विशेष स्तनधारी जीव पाया जाता है। राजस्थान का कानपुर ‘कोटा शहर’ चम्बल नदी के किनारे स्थित है।
चम्बल की प्रमुख सहायक नदियाँ –
(i) मेज नदी –
चम्बल की सहायक मेज नदी भीलवाड़ा के बिजोलिया से निकलकर बूंदी के ‘लाखेरी’ नामक स्थान पर आकर चम्बल में मिल जाती है। मेज की दो सहायक नदियाँ मांगली व कुराल भी इसी क्षेत्र में बहती है। मांगली नदी पर बूंदी जिले में ‘भीमलत जलप्रपात’ (भीमलत तालाब-भीलवाड़ा) बनाया गया है।
(ii) पार्वती नदी –
पार्वती नदी मध्यप्रदेश के देवास जिले में स्थित ‘सेहौर क्षेत्र’ से निकलकर बारां जिले के ‘करियाहाट गांव’ से राजस्थान में प्रवेश करती है। यहाँ से ये नदी मध्य प्रदेश व कोटा की सीमा बनाने के बाद सवाई माधोपुर जिले के नजदीक ‘पालीया गाँव’ में आकर चम्बल में मिल जाती है।
पार्वती की मुख्य सहायक नदियों-बैंथली नदी के किनारे बैंथली परियोजना, बिलास नदी के किनारे बिलास परियोजना व ल्हासी नदी के किनारे ल्हासी परियोजना चल रही है, जो तीनों बाराँ जिले में अवस्थित है। यह राजस्थान व मध्यप्रदेश के मध्य दो बार सीमा बनाती है।
(iii) कालीसिंध नदी –
चम्बल की सहायक कालीसिंध नदी मध्यप्रदेश के ‘देवास जिले’ के बागली गाँव से निकलकर झालावाड़ जिले के ‘रायपुर’ नामक स्थान से राजस्थान में प्रवेश करती है। झालावाड़ शहर एवं वहाँ स्थित गागरोन दुर्ग कालीसिंध नदी के किनारे स्थित है। कोटा-झालावाड़ की सीमा बनाने के उपरान्त कोटा के ‘नानेरा’ नामक स्थान पर आकर कालीसिंध नदी चम्बल नदी में मिल जाती है। झालावाड़ जिले में कालीसिंध परियोजना (हरिश्चन्द्र साग्र परियोजना) का निर्माण किया गया है।
(A) आहू नदी –
कालीसिंध की सहायक आहू नदी मध्यप्रदेश के सुसनेर क्षेत्र से निकलकर झालावाड़ जिले के नंदपुर नामक स्थान से राजस्थान में प्रवेश करती है। यहाँ से यह नदी झालावाड़ जिले में स्थित गागरोन नामक स्थान पर कालीसिंध में मिल जाती है। कालीसिंध व आहू के संगम पर झालावाड़ जिले में ‘गागरोन का जलदुर्ग’ स्थित है। आहू नदी की सहायक नदी पिपलाद पर पिपलाद परियोजना का निर्माण किया गया है।
(B) परवन नदी –
कालीसिंध की सहायक परवन नदी का उद्गम मध्य प्रदेश में मालवा के पठार से अजनार व घोड़ा पछाड़ नामक नदियों की संयुक्त धारा के रूप में होता है। यह राजस्थान में झालावाड़ जिले के मनोहरथाना तहसील के खरीबोर नामक स्थान से प्रवेश करती है। मनोहरथाना दुर्ग (झालावाड़) परवन एवं कालीखो नदी के संगम पर स्थित है। यहाँ से यह नदी साँपों की शरणस्थली के नाम से प्रसिद्ध शेरगढ़ अभयारण्य (बाराँ) से होकर पलायता (बाराँ) के समीप रामगढ़ नामक स्थान पर कालीसिंध में मिल जाती है।
ध्यातव्य रहे-बारां जिला कालीसिंध, पार्वती व परवन नदियों के बीच स्थित है।
(C) निमाज नदी –
परवन नदी की सहायक नदी निमाज मध्यप्रदेश की विंध्याचल पहाड़ियों में स्थित मानपुरा तहसील के राजगढ़ नामक स्थान से निकलकर झालावाड़ जिले के कोल्हू खेड़ी नामक स्थान से राजस्थान में प्रवेश करती है, यहाँ से यह नदी झालावाड़ (अकलेरा) में आकर ‘परवन नदी’ में मिलती है।
(iii) बामनी/ब्राह्मणी नदी –
इस नदी का उद्गम चित्तौड़गढ़ जिले के हरिपुरा गाँव से होता है, जहाँ से यह नदी बहते हुए चित्तौड़गढ़ में भैंसरोड़गढ़ दुर्ग के समीप चम्बल नदी में मिल जाती है। ध्यान रहे-भैंसरोड़गढ़ दुर्ग एक जलदुर्ग है, जो ब्राह्मणी एवं चम्बल नदी के किनारे पर अवस्थित है।
(iv) बनास नदी –
बनास नदी को ‘वशिष्ठी’, ‘वर्णाशा’, ‘वन की आशा’ आदि उपनामों से जाना जाता है। बनास नदी राजस्थान में पूर्ण बहाव की दृष्टि से सबसे लम्बी नदी है, जिसकी कुल लम्बाई 512 किमी. है। इसका सर्वाधिक प्रवाह टोंक जिले में है। टोंक व अजमेर जिले में इसका प्रवाह क्षेत्र सर्पिलाकार है। बनास नदी का उद्गम ‘राजसमंद जिले’ में कुंभलगढ़ के पास स्थित ‘खमनौर/| जसवंतगढ़’ की पहाड़ियों से होता है।
अपने उद्गम स्थल से उदयपुर, चित्तौड़गढ़ होते हुए भीलवाड़ा जिले में प्रवेश करती है, जहाँ ‘माण्डलगढ़’ के समीप नंदराय नामक ग्राम में ‘कोठारी नदी’ बनास नदी में आकर मिल जाती है, जहाँ मेजा बाँध बनाया गया है। बींगोद (भीलवाड़ा) में बनास नदी में मेनाल व बेड़च नदी मिलकर ‘त्रिवेणी संगम’ बनाती हैं। यह नदी टोंक जिले में ‘सर्पिलाकार’ में बहती है। टोंक की देवली तहसील के राजमहल गाँव के नजदीक ‘बीसलपुर’ नामक स्थान पर ‘खारी’ व ‘डाई’ नदी बनास नदी में आकर मिलती है जहाँ ‘त्रिवेणी संगम’ बनता है। इसी संगम पर ‘बीसलपुर बांध’ बनाया गया है। कनक सागर बाँध (बूँदी) बनास नदी पर स्थित है।
यहाँ से यह नदी राजसमंद, चित्तौड़गढ़, भीलवाड़ा, अजमेर, टोंक जिले में बहती हुई अन्ततः सवाई माधोपुर जिले की खण्डार तहसील के बड़वास गांव के पास ‘रामेश्वरम धाम’ नामक स्थान पर ‘त्रिवेणी संगम’ में सीप नदी के साथ चंबल नदी में विलीन हो जाती है। माही नदी राजस्थान में दक्षिण से प्रवेश करके पश्चिम में प्रवाहित होकर पुनः दक्षिण की ओर मुड़ जाती है। बनास नदी चम्बल की सबसे प्रमुख सहायक नदी है। टोंक शहर बनास नदी किनारे स्थित है।
बनास की सहायक नदियाँ-
(A) बेड़च (आयड़) नदी –
बनास की सहायक बेड़च नदी (157 किमी.) आयड़ के नाम से ‘गोगुन्दा’ से निकलती है। उदयपुर शहर आयड़ नदी के किनारे स्थित है, जहाँ स्थित उदयसागर झील में से निकलने के बाद आयड़ का नाम ‘बेड़च’ हो जाता है। यहाँ से यह नदी चित्तौड़गढ़ जिले में बहती है, जहाँ गंभीरी नदी आकर बेड़च नदी में मिलती है। (ध्यान रहे-चित्तौड़गढ़ शहर बेड़च व गंभीरी के संगम पर बसा है) यहाँ से बेड़च नदी भीलवाड़ा जिले की मांडलगढ़ तहसील के ‘बींगोद’ में आकर बनास नदी में मिल जाती है।
(a) गंभीरी नदी –
बेड़च की सहायक गंभीरी नदी का उद्गम मध्यप्रदेश के रतलाम जिले के जावद गाँव से होता है, जो राजस्थान में निम्बाहेड़ा (चित्तौड़गढ़) में प्रवेश करके चित्तौड़गढ़ शहर के नजदीक बेड़च नदी में मिल जाती है, जिसके समीप अप्पावास गाँव में घोसुण्डा बाँध बना हुआ है।
(B) मानसी नदी –
मानसी नदी का उद्गम अजमेर जिले की सिलोरा की पहाड़ियों से होता है, जहाँ से यह नदी टोंक जिले में बहती हुई गहलोद नामक स्थान पर बनास में मिल जाती है।
(C) मेनाल नदी –
बनास की सहायक मेनाल नदी चित्तौड़गढ़ जिले में ‘बेगूँ’ से निकलती है और भीलवाड़ा में प्रवेश करते ही मेनाल जल प्रपात बनाती है और अन्त में भीलवाड़ा जिले के ‘बींगोद’ में आकर बनास में मिलते हुए बनास, बेड़च व मेनाल का ‘त्रिवेणी संगम’ बनाती हैं।
(D) मोरेल नदी –
बनास की सहायक मोरेल नदी का उद्गम जयपुर जिले की चाकसू तहसील के दूणी गाँव से होता है, जहाँ से निकलकर – यह नदी सवाई माधोपुर जिले की खण्डार तहसील के पास बनास – नदी में मिल जाती है। मोरेल नदी की सहायक नदी ढूँढ नदी का उद्गम जयपुर जिले की अचरोल की पहाड़ियों से होता है, जो दौसा जिले में बहते हुए लालसोट के पास मोरेल नदी में मिल जाती है।
(E) कोठारी नदी –
बनास की सहायक कोठारी नदी (145 किमी.) राजसमन्द जिले में ‘दिवेर की पहाड़ियों’ से निकलकर भीलवाड़ा में बहने के बाद माण्डलगढ़ के नन्दराय नामक स्थान पर आकर बनास में मिल जाती है। कोठारी नदी पर भीलवाड़ा में बने ‘मेजा बांध’ से भीलवाड़ा शहर को जल उपलब्ध कराया जाता है।
(F) खारी नदी –
बनास की सहायक खारी नदी राजसमन्द जिले की ‘बिजराल पहाड़ी’ से निकलकर भीलवाड़ा के आसीन्द शहर के किनारे से बहते हुए अजमेर के बाद टोंक में आकर देवली तहसील के राजमहल गाँव के नजदीक बीसलपुर बांध के समीप बनास में मिल – जाती है।
(G) डाई नदी –
बनास की सहायक डाई नदी का उद्गम अजमेर जिले की किशनगढ़ पहाड़ी से होता है, जो अजमेर व टोंक में बहते हुए टोंक जिले की देवली तहसील के राजमहल गाँव के नजदीक बीसलपुर बांध के समीप बनास में मिल जाती है अर्थात् बीसलपुर – बाँध के समीप बनास डाई खारी मिलकर त्रिवेणी संगम बनाती है।
3. गंभीर नदी –
यमुना की सहायक नदी गंभीर नदी करौली जिले में ‘नादौती गांव’ से निकलकर कैलादेवी के मंदिर के पीछे से होकर – सवाईमाधोपुर, करौली (राज्य का सबसे बड़ा मिट्टी का बांध ‘पाँचना बांध’ करौली में है, जो इसी नदी भद्रावती, भेसावाटा, बरखेड़ा, ऐटा, माँची से सम्बन्धित है), भरतपुर (भरतपुर का सबसे बड़ा बाँध अजान बाँध इसी नदी के किनारे पर है), धौलपुर में बहने के बाद उत्तर प्रदेश के ‘मैनपुरी’ में जाकर यमुना में मिल जाती है।
गंभीर नदी की सहायक पार्वती द्वितीय नदी का उद्गम करौली जिले की सपोटरा तहसील से होता है, जिसके किनारे पार्वती बाँध बना हुआ है। यहाँ से यह नदी धौलपुर के राजाखेड़ा तहसील में आकर गंभीर नदी में मिलती है।