Plant Physiology पादप कार्यिकी

पादप कार्यिकी

(Plant Physiology)

1. शुद्ध जल का जल विभव (Water Potential) मानक तापमान पर कितना होता है?

(A) 100

(B) शून्य

(C) ऋणात्मक

(D) धनात्मक

इसका सही उत्तर (B) शून्य है।

पादप कार्यिकी (Plant Physiology) के सिद्धांतों के अनुसार, जल विभव ($\Psi_w$) के बारे में मुख्य तथ्य नीचे दिए गए हैं:

जल विभव (Water Potential)

  • परिभाषा: जल के अणुओं की मुक्त ऊर्जा या उनकी गतिज ऊर्जा (Kinetic Energy) के माप को जल विभव कहते हैं।

  • शुद्ध जल: मानक तापमान और बिना किसी दबाव (Pressure) के, शुद्ध जल का जल विभव शून्य ($0$) माना जाता है। यह जल विभव का अधिकतम संभव मान है।

  • विलयन (Solution): जब शुद्ध जल में कोई विलेय (Solute) घोला जाता है, तो मुक्त ऊर्जा कम हो जाती है। इसलिए, किसी भी विलयन का जल विभव हमेशा शून्य से कम यानी ऋणात्मक (Negative) होता है।


महत्वपूर्ण सूत्र:

$$\Psi_w = \Psi_s + \Psi_p$$
  • ψs = विलेय विभव (Solute Potential) – यह हमेशा ऋणात्मक होता है।

  • ψp = दाब विभव (Pressure Potential) – यह आमतौर पर धनात्मक होता है।

 

2. एक कोशिका को अतिपरासरी (Hypertonic) घोल में रखने पर वह जीवद्रव्य कुंचित हो जाती है। इस प्रक्रिया में पानी सबसे पहले कहाँ से निकलता है?

(A) केंद्रक से

(B) कोशिका द्रव्य से

(C) रसधानी (Vacuole) से

(D) कोशिका भित्ति से

इसका सही उत्तर (B) कोशिका द्रव्य से है।

जीवद्रव्यकुंचन (Plasmolysis) के दौरान पानी के बाहर निकलने का एक निश्चित क्रम होता है, जिसे समझना महत्वपूर्ण है:

पानी के निकास का क्रम (Sequence of Water Loss)

जब एक जीवित पादप कोशिका को अतिपरासरी (Hypertonic) घोल में रखा जाता है, तो बहिःपरासरण (Exosmosis) की प्रक्रिया शुरू होती है:

  1. प्रथम चरण (कोशिका द्रव्य): सबसे पहले पानी कोशिका द्रव्य (Cytoplasm) से बाहर निकलता है।

  2. द्वितीय चरण (रसधानी): इसके बाद, पानी रसधानी (Vacuole) से बाहर आना शुरू होता है।

महत्वपूर्ण बिंदु:

  • जब कोशिका द्रव्य और रसधानी दोनों से पानी निकल जाता है, तो प्रोटोप्लास्ट (Protoplast) सिकुड़कर कोशिका भित्ति से अलग हो जाता है और एक कोने में इकट्ठा हो जाता है।

  • इस स्थिति में कोशिका और कोशिका भित्ति के बीच के स्थान में वही अतिपरासरी घोल भर जाता है जिसमें कोशिका को रखा गया था।

 

3. जड़ों में जल का वह मार्ग जो कोशिका भित्ति और अंतर्कोशिकीय स्थानों से होकर गुजरता है, क्या कहलाता है?

(A) सिम्प्लास्ट

(B) एपोप्लास्ट

(C) रिक्तिका मार्ग

(D) परासरण मार्ग

इसका सही उत्तर (B) एपोप्लास्ट (Apoplast) है।

जड़ों में जल अवशोषण और परिवहन के दो मुख्य मार्ग होते हैं। एपोप्लास्ट के बारे में मुख्य जानकारी नीचे दी गई है:

एपोप्लास्ट मार्ग (Apoplast Pathway)

  • परिभाषा: यह मार्ग कोशिका के निर्जीव भागों से होकर गुजरता है, जैसे कि कोशिका भित्ति (Cell Wall) और कोशिकाओं के बीच के अंतर्कोशिकीय स्थान (Intercellular Spaces)

  • विशेषता: इस मार्ग में जल को किसी कोशिका झिल्ली (Cell Membrane) को पार नहीं करना पड़ता, इसलिए यह मार्ग तेज होता है।

  • बाधा: जब जल अंतस्त्वचा (Endodermis) तक पहुँचता है, तो वहां मौजूद कैस्पेरियन पट्टियाँ (Casparian Strips) (सुबेरिन युक्त) इस मार्ग को रोक देती हैं। इसके बाद जल को मजबूरन सिम्प्लास्ट मार्ग अपनाना पड़ता है।


तुलना: एपोप्लास्ट बनाम सिम्प्लास्ट

मार्ग माध्यम प्रकृति गति
एपोप्लास्ट कोशिका भित्ति, रिक्त स्थान निर्जीव (Non-living) तीव्र
सिम्प्लास्ट कोशिका द्रव्य, प्लाज्मोडेस्मेटा सजीव (Living) धीमी

 

4. एंडोडर्मिस में सुबेरिन के जमाव वाली पट्टियाँ, जो जल के एपोप्लास्ट मार्ग को रोकती हैं:

(A) जलरंध्र

(B) कैस्पेरियन पट्टियाँ

(C) लेंटिसेल्स

(D) टायलोसिस

इसका सही उत्तर (B) कैस्पेरियन पट्टियाँ (Casparian Strips) है।

जड़ों में जल परिवहन के दौरान अंतस्त्वचा (Endodermis) एक ‘चेकपोस्ट’ की तरह कार्य करती है। इसके बारे में मुख्य विवरण नीचे दिए गए हैं:

कैस्पेरियन पट्टियाँ (Casparian Strips)

  • खोज: इनकी खोज रॉबर्ट कैस्परी ने की थी।

  • पदार्थ: ये मुख्य रूप से सुबेरिन (Suberin) नामक जल-रोधी (Waterproof) मोम जैसे पदार्थ के जमाव से बनी होती हैं। कभी-कभी इनमें लिग्निन भी पाया जाता है।

  • स्थान: ये अंतस्त्वचा की कोशिकाओं की अरीय (Radial) और स्पर्शरेखीय (Tangential) भित्तियों पर पाई जाती हैं।

कार्य और प्रभाव

  1. मार्ग परिवर्तन: चूँकि सुबेरिन पानी के लिए अपारगम्य है, इसलिए जल एपोप्लास्ट मार्ग (कोशिका भित्ति के माध्यम से) से आगे नहीं जा पाता।

  2. सिम्प्लास्ट में प्रवेश: यहाँ जल को मजबूरन कोशिका झिल्ली को पार कर सिम्प्लास्ट मार्ग (कोशिका द्रव्य के माध्यम से) में प्रवेश करना पड़ता है।

  3. नियंत्रण: यह व्यवस्था पौधे को यह नियंत्रित करने की अनुमति देती है कि मिट्टी से कौन से खनिज और कितनी मात्रा में जाइलम तक पहुँचेंगे।


अन्य विकल्पों का अर्थ:

  • जलरंध्र (Hydathodes): पत्तियों के किनारों पर स्थित छिद्र जिनसे ‘बिंदुस्राव’ (Guttation) होता है।

  • लेंटिसेल्स (Lenticels): काष्ठीय तनों की छाल में स्थित छिद्र जो गैसों के विनिमय में सहायक होते हैं।

  • टायलोसिस (Tyloses): पुराने जाइलम (Heartwood) की वाहिकाओं में पैरेन्काइमा कोशिकाओं की गुब्बारे जैसी वृद्धि, जो जल परिवहन को रोक देती है।

 

5. जल के अणुओं का जाइलम वाहिकाओं की भित्ति के प्रति आकर्षण क्या कहलाता है?

(A) संसजक बल (Cohesion)

(B) आसंजक बल (Adhesion)

(C) पृष्ठ तनाव

(D) मूल दाब

इसका सही उत्तर (B) आसंजक बल (Adhesion) है।

वाष्पोत्सर्जन-खिंचाव सिद्धांत (Transpiration Pull Theory) के अनुसार, जाइलम में जल के परिवहन के लिए दो प्रकार के बल सबसे महत्वपूर्ण होते हैं:

1. आसंजक बल (Adhesion)

  • परिभाषा: अलग-अलग प्रकार के अणुओं के बीच लगने वाले आकर्षण बल को आसंजन कहते हैं।

  • जाइलम में भूमिका: जल के अणुओं का जाइलम वाहिकाओं (Xylem Vessels) और वाहिनिकाओं (Tracheids) की लिग्निन युक्त भित्तियों के प्रति जो आकर्षण होता है, उसे ही ‘आसंजक बल’ कहा जाता है। यह जल के स्तंभ को नीचे गिरने से रोकता है।


2. संसजक बल (Cohesion)

  • परिभाषा: एक ही पदार्थ के अणुओं (जैसे जल के दो अणुओं) के बीच लगने वाले आपसी आकर्षण को संसजन कहते हैं।

  • जाइलम में भूमिका: यह बल जल के अणुओं को एक-दूसरे से जोड़कर रखता है, जिससे जाइलम के अंदर जल का एक अटूट स्तंभ (Continuous Column) बना रहता है।

अन्य विकल्प:

  • पृष्ठ तनाव (Surface Tension): इसके कारण जल के अणु गैसीय अवस्था की तुलना में द्रव अवस्था में एक-दूसरे के प्रति अधिक आकर्षित होते हैं।

  • मूल दाब (Root Pressure): यह जड़ों में सक्रिय अवशोषण के कारण उत्पन्न होने वाला धनात्मक दाब है, जो कम ऊँचाई वाले पौधों में जल को ऊपर भेजने में मदद करता है।

 

6. रसारोहण (Ascent of Sap) के लिए ‘वाष्पोत्सर्जन खिंचाव सिद्धांत’ किसने दिया था?

(A) जे.सी. बोस

(B) डिक्सन एवं जॉली

(C) स्टीफन हेल्स

(D) प्रीस्टले

इसका सही उत्तर (B) डिक्सन एवं जॉली (Dixon and Joly) है।

रसारोहण (Ascent of Sap) की व्याख्या के लिए यह सबसे मान्य और आधुनिक सिद्धांत है। इसके बारे में मुख्य विवरण नीचे दिए गए हैं:

वाष्पोत्सर्जन खिंचाव सिद्धांत (Transpiration Pull Theory)

इसे संसंजन-तनाव सिद्धांत (Cohesion-Tension Theory) के नाम से भी जाना जाता है।

  • प्रतिपादन: हेनरी डिक्सन और जॉन जॉली ने 1894 में यह सिद्धांत दिया था।

  • मुख्य बिंदु: 1. वाष्पोत्सर्जन खिंचाव: पत्तियों से पानी के वाष्पित होने पर एक ‘ऋणात्मक दाब’ (Negative Pressure) उत्पन्न होता है, जो जाइलम के जल स्तंभ को ऊपर खींचता है।

    2. संसंजन (Cohesion): जल के अणुओं के बीच मजबूत आकर्षण (H-bonding) जिससे जल स्तंभ टूटता नहीं है।

    3. आसंजन (Adhesion): जल के अणुओं का जाइलम की भित्तियों से जुड़ाव।


अन्य विकल्पों का परिचय:

  • जे.सी. बोस (J.C. Bose): इन्होंने रसारोहण का ‘स्पंदन सिद्धांत’ (Pulsation Theory) दिया था, जिसमें उन्होंने बताया कि अंतस्त्वचा की कोशिकाओं में धड़कन (Pulsation) होती है।

  • स्टीफन हेल्स (Stephen Hales): इन्हें ‘पादप कार्यिकी का जनक’ (Father of Plant Physiology) कहा जाता है। इन्होंने ‘मूल दाब’ (Root Pressure) शब्द दिया था।

  • जोसेफ प्रीस्टले (Joseph Priestley): इन्होंने ऑक्सीजन की खोज की थी और पौधों द्वारा हवा को शुद्ध करने के महत्व को बताया था।

 

7. स्टोमेटा के खुलने के लिए उत्तरदायी ‘K+ आयन स्थानांतरण सिद्धांत’ किसने प्रतिपादित किया?

(A) लेविट (Levitt)

(B) डार्विन

(C) मुंच

(D) केल्विन

इसका सही उत्तर (A) लेविट (Levitt) है।

रंध्रों (Stomata) के खुलने और बंद होने की प्रक्रिया को समझाने के लिए यह सबसे आधुनिक और सर्वमान्य सिद्धांत है। इसे ‘सक्रिय पोटैशियम आयन (K+) स्थानांतरण सिद्धांत’ कहा जाता है।

लेविट का सिद्धांत (1974)

  • प्रक्रिया: दिन के समय, रक्षक कोशिकाओं (Guard Cells) में मैलिक एसिड का निर्माण होता है, जो H+ और मैलेट आयनों में टूट जाता है।

  • K+ का प्रवेश: H+ आयन बाहर निकलते हैं और उनके बदले में सक्रिय रूप से K+ आयन सहायक कोशिकाओं से रक्षक कोशिकाओं के अंदर प्रवेश करते हैं।

  • असर: K+ आयनों की सांद्रता बढ़ने से रक्षक कोशिकाओं का परासरण दाब (OP) बढ़ जाता है, जिससे अंतःपरासरण (Endosmosis) होता है और रंध्र खुल जाते हैं।


अन्य विकल्पों का परिचय:

  • मुंच (Munch): इन्होंने ‘सामूहिक प्रवाह परिकल्पना’ (Mass Flow Hypothesis) दी थी, जो फ्लोएम में भोजन (शर्करा) के परिवहन को समझाती है।

  • केल्विन (Calvin): इन्होंने प्रकाश संश्लेषण के दौरान CO2 स्थिरीकरण के लिए ‘केल्विन चक्र’ (C3 चक्र) की खोज की थी।

  • डार्विन (Darwin): इन्होंने विकासवाद का सिद्धांत दिया था, लेकिन पादप कार्यिकी में उन्होंने ‘प्रकाशनुवर्तन’ (Phototropism) पर कार्य किया था।

 

8. बिंदुस्राव (Guttation) की प्रक्रिया पौधों में कब देखी जाती है?

(A) जब वाष्पोत्सर्जन बहुत अधिक हो

(B) जब मूल दाब अधिक और वाष्पोत्सर्जन कम हो

(C) तेज धूप के समय

(D) दोपहर के समय

इसका सही उत्तर (B) जब मूल दाब अधिक और वाष्पोत्सर्जन कम हो है।

बिंदुस्राव (Guttation) की प्रक्रिया के पीछे के मुख्य कारण और परिस्थितियाँ नीचे दी गई हैं:

बिंदुस्राव (Guttation) की अनुकूल परिस्थितियाँ

  • समय: यह प्रक्रिया मुख्य रूप से रात के समय या सुबह-सुबह देखी जाती है।

  • मूल दाब (Root Pressure): जब मिट्टी में नमी अधिक होती है, तो जड़ें सक्रिय रूप से जल का अवशोषण करती हैं, जिससे जड़ों में एक धनात्मक दाब (Positive Pressure) उत्पन्न होता है जिसे ‘मूल दाब’ कहते हैं।

  • वाष्पोत्सर्जन (Transpiration): रात के समय या अधिक आर्द्रता (Humidity) के कारण वाष्पोत्सर्जन की दर बहुत कम होती है।

  • परिणाम: चूँकि पानी ऊपर तो चढ़ रहा है लेकिन पत्तियों से वाष्प बनकर उड़ नहीं पा रहा, इसलिए यह पानी पत्तियों के किनारों पर स्थित विशेष छिद्रों, जिन्हें जलरंध्र (Hydathodes) कहते हैं, से बूंदों के रूप में बाहर निकलता है।

बिंदुस्राव और वाष्पोत्सर्जन में अंतर:

विशेषता वाष्पोत्सर्जन (Transpiration) बिंदुस्राव (Guttation)
अवस्था जल वाष्प के रूप में जल बूंदों के रूप में
शुद्धता शुद्ध जल जल के साथ खनिज व कार्बनिक पदार्थ
छिद्र रंध्र (Stomata) जलरंध्र (Hydathodes)
समय मुख्य रूप से दिन में रात या सुबह के समय

 

9. वाष्पोत्सर्जन को मापने के लिए किस उपकरण का उपयोग किया जाता है?

(A) ऑक्सैनोमीटर

(B) पोटोमीटर

(C) पोरोमीटर

(D) मैनोमीटर

इसका सही उत्तर (B) पोटोमीटर (Potometer) है।

वाष्पोत्सर्जन (Transpiration) की दर को मापने के लिए पोटोमीटर सबसे उपयुक्त उपकरण है। पादप कार्यिकी (Plant Physiology) में उपयोग होने वाले विभिन्न उपकरणों का विवरण नीचे दिया गया है:

1. पोटोमीटर (Potometer)

  • उपयोग: यह उस दर को मापता है जिस दर से एक पौधा पानी को अवशोषित करता है, जो लगभग वाष्पोत्सर्जन की दर के बराबर होती है।

  • प्रकार: इसके प्रसिद्ध उदाहरण गेनान्ग पोटोमीटर (Ganong’s Potometer) और फार्मर पोटोमीटर हैं।

  • कार्य विधि: इसमें एक हवा के बुलबुले (Air bubble) की गति के आधार पर वाष्पोत्सर्जन की दर मापी जाती है।


अन्य विकल्पों का विवरण:

  • ऑक्सैनोमीटर (Auxanometer): इसका उपयोग पौधे की वृद्धि (Growth) मापने के लिए किया जाता है।

  • पोरोमीटर (Porometer): यह रंध्रों (Stomata) के खुलने के व्यवहार और रंध्रीय क्षेत्र (Stomatal area) को मापने के काम आता है।

  • मैनोमीटर (Manometer): इसका उपयोग मूल दाब (Root Pressure) और गैसों के दाब को मापने के लिए किया जाता है।

 

10. मरुस्थलीय पौधों (जैसे कैक्टस) में स्टोमेटा कब खुलते हैं?

(A) दिन के समय

(B) रात के समय (Scotoactive)

(C) दोपहर में

(D) कभी नहीं

इसका सही उत्तर (B) रात के समय (Scotoactive) है।

मरुस्थलीय पौधों (जैसे कैक्टस, नागफनी और अन्य मांसल पौधों) ने पानी बचाने के लिए एक विशेष अनुकूलन विकसित किया है। इसके बारे में मुख्य जानकारी नीचे दी गई है:

स्कोटोएक्टिव रंध्र (Scotoactive Stomata)

  • परिभाषा: ऐसे रंध्र जो रात के अंधेरे में खुलते हैं और दिन के तेज उजाले में बंद रहते हैं, उन्हें स्कोटोएक्टिव रंध्र कहा जाता है।

  • कारण: मरुस्थल में दिन का तापमान बहुत अधिक होता है। यदि रंध्र दिन में खुलेंगे, तो वाष्पोत्सर्जन (Transpiration) के कारण पौधा बहुत सारा पानी खो देगा और सूख जाएगा।

CAM चक्र (Crassulacean Acid Metabolism)

ये पौधे एक विशेष प्रकार का प्रकाश संश्लेषण करते हैं जिसे CAM चक्र कहते हैं:

  1. रात में: रंध्र खुलते हैं, CO2 अंदर आती है और इसे ‘मैलिक एसिड’ के रूप में जमा कर लिया जाता है।

  2. दिन में: रंध्र बंद हो जाते हैं ताकि पानी न उड़े, और रात में जमा की गई CO2 का उपयोग करके भोजन बनाया जाता है।

 

11. प्रकाश संश्लेषण के दौरान जल के प्रकाशिक अपघटन (Photolysis) के लिए आवश्यक तत्व हैं:

(A) Mg और Fe

(B) Mn और Cl

(C) Cu और Zn

(D) Mo और B

इसका सही उत्तर (B) Mn और Cl है।

प्रकाश संश्लेषण की प्रकाशिक अभिक्रिया (Light Reaction) के दौरान जल के अणुओं का टूटना एक अत्यंत महत्वपूर्ण चरण है। इसके बारे में मुख्य विवरण नीचे दिए गए हैं:

जल का प्रकाशिक अपघटन (Photolysis of Water)

  • प्रक्रिया: सूर्य के प्रकाश की उपस्थिति में जल का अणु हाइड्रोजन आयन (H+), इलेक्ट्रॉन (e) और ऑक्सीजन (O2) में टूट जाता है।

  • आवश्यक खनिज तत्व: इस प्रक्रिया को सुचारू रूप से चलाने के लिए मैंगनीज (Mn) और क्लोरीन (Cl) आयनों की अनिवार्य आवश्यकता होती है। कुछ शोधों में कैल्शियम (Ca) को भी इसके लिए सहायक माना गया है।

  • स्थान: यह प्रक्रिया क्लोरोप्लास्ट के थायलाकोइड (Thylakoid) की झिल्ली के अंदरूनी हिस्से में PS-II (Photosystem II) के पास होती है।

 

अन्य विकल्पों के कार्य:

  • Mg (मैग्नीशियम): यह क्लोरोफिल अणु के केंद्र में स्थित होता है और एंजाइमों को सक्रिय करता है।

  • Fe (लोहा): यह इलेक्ट्रॉन परिवहन श्रृंखला (जैसे साइटोक्रोम) का मुख्य घटक है।

  • Mo (मोलिब्डेनम): यह नाइट्रोजन स्थिरीकरण (Nitrogen Fixation) के लिए जिम्मेदार ‘नाइट्रोजनेज’ एंजाइम का घटक है।

  • Zn (जस्ता): यह ‘ऑक्सिन’ (Auxin) हार्मोन के संश्लेषण में मदद करता है।

 

12. प्रकाश संश्लेषण की प्रकाशिक अभिक्रिया (Light Reaction) क्लोरोप्लास्ट के किस भाग में होती है?

(A) स्ट्रोमा

(B) थायलाकोइड/ग्रैना

(C) बाहरी झिल्ली

(D) पेरिप्लास्टिडियल स्थान

इसका सही उत्तर (B) थायलाकोइड/ग्रैना है।

प्रकाश संश्लेषण की प्रक्रिया क्लोरोप्लास्ट के दो अलग-अलग हिस्सों में पूरी होती है, जिन्हें उनकी कार्यप्रणाली के आधार पर बांटा गया है:

1. प्रकाशिक अभिक्रिया (Light Reaction)

  • स्थान: यह क्लोरोप्लास्ट के ग्रैना (Grana) या थायलाकोइड (Thylakoid) की झिल्लियों में होती है।

  • कारण: यहाँ क्लोरोफिल और अन्य प्रकाश-संश्लेषी वर्णक (Pigments) स्थित होते हैं जो सौर ऊर्जा को अवशोषित कर सकते हैं।

  • उत्पाद: इस प्रक्रिया में सौर ऊर्जा को रासायनिक ऊर्जा (ATP और NADPH) में बदला जाता है और उप-उत्पाद के रूप में ऑक्सीजन ($O_2$) निकलती है।


2. अप्रकाशिक अभिक्रिया (Dark Reaction / Calvin Cycle)

  • स्थान: यह क्लोरोप्लास्ट के स्ट्रोमा (Stroma) (तरल भाग) में होती है।

  • प्रक्रिया: यहाँ प्रकाश की सीधी आवश्यकता नहीं होती, बल्कि प्रकाशिक अभिक्रिया में बने ATP और NADPH का उपयोग करके CO2 से शर्करा (Glucose) बनाई जाती है।

संक्षिप्त तुलना:

विशेषता प्रकाशिक अभिक्रिया (Light Reaction) अप्रकाशिक अभिक्रिया (Dark Reaction)
स्थान थायलाकोइड / ग्रैना स्ट्रोमा
ऊर्जा स्रोत सूर्य का प्रकाश ATP और NADPH
मुख्य कार्य जल का अपघटन, ATP निर्माण CO2 का स्थिरीकरण (Sugar निर्माण)

 

13. केल्विन चक्र (C3 चक्र) में CO2 का प्राथमिक ग्राही (Acceptor) अणु कौन सा है?

(A) PEP

(B) RuBP (रिबुलोस 1,5-बिसफॉस्फेट)

(C) PGA

(D) ऑक्जेलो एसिटिक एसिड

इसका सही उत्तर (B) RuBP (रिबुलोस 1,5-बिसफॉस्फेट) है।

केल्विन चक्र (C3 चक्र) में CO2 के स्थिरीकरण (Fixation) की प्रक्रिया को समझने के लिए मुख्य बिंदु नीचे दिए गए हैं:

CO2 स्थिरीकरण और RuBP

  • प्राथमिक ग्राही: C3 पौधों में, वातावरण से आने वाली CO2 को सबसे पहले RuBP (एक 5-कार्बन वाली शर्करा) ग्रहण करती है।

  • एंजाइम: इस प्रक्रिया को RuBisCO (रुबिस्को) नामक एंजाइम उत्प्रेरित करता है, जो दुनिया में सबसे प्रचुर मात्रा में पाया जाने वाला प्रोटीन है।

  • प्रथम स्थिर उत्पाद: जब CO2 और RuBP मिलते हैं, तो 3-कार्बन वाला एक अस्थाई यौगिक बनता है जो तुरंत PGA (3-फॉस्फोग्लिसरिक एसिड) के दो अणुओं में टूट जाता है। चूँकि पहला स्थिर उत्पाद 3-कार्बन वाला है, इसीलिए इसे C3 चक्र कहते हैं।


अन्य विकल्पों का विवरण:

  • PEP (फॉस्फोएनोल पाइरुवेट): यह C4 पौधों (जैसे मक्का, गन्ना) में CO2 का प्राथमिक ग्राही होता है।

  • PGA (फॉस्फोग्लिसरिक एसिड): यह C3 चक्र का प्रथम स्थिर उत्पाद है, न कि ग्राही।

  • ऑक्जेलो एसिटिक एसिड (OAA): यह C4 चक्र का प्रथम स्थिर उत्पाद है।


याद रखने योग्य तालिका:

चक्र प्राथमिक ग्राही (Acceptor) प्रथम स्थिर उत्पाद (Product)
C3 चक्र RuBP (5-Carbon) PGA (3-Carbon)
C4 चक्र PEP (3-Carbon) OAA (4-Carbon)

 

14. C4 पौधों में CO2 स्थिरीकरण का प्रथम स्थायी उत्पाद क्या है?

(A) फॉस्फोग्लिसरिक एसिड

(B) ऑक्जेलो एसिटिक एसिड (OAA)

(C) मैलिक एसिड

(D) पाइरुविक एसिड

इसका सही उत्तर (B) ऑक्जेलो एसिटिक एसिड (OAA) है।

C4 पादपों (जैसे मक्का, गन्ना, ज्वार) में प्रकाश संश्लेषण की प्रक्रिया C3 पादपों से थोड़ी भिन्न और अधिक कुशल होती है। इसके मुख्य बिंदु नीचे दिए गए हैं:

C4 चक्र (Hatch-Slack Cycle)

  • प्रथम स्थायी उत्पाद: CO2 स्थिरीकरण के बाद बनने वाला पहला स्थिर यौगिक ऑक्जेलो एसिटिक एसिड (OAA) होता है। चूँकि इसमें 4 कार्बन परमाणु होते हैं, इसीलिए इस चक्र को C4 चक्र कहा जाता है।

  • प्राथमिक ग्राही: इसमें CO2 को सबसे पहले PEP (फॉस्फोएनोल पाइरुवेट) ग्रहण करता है।

  • एंजाइम: इस प्रक्रिया को PEPcase एंजाइम उत्प्रेरित करता है। खास बात यह है कि यह एंजाइम ऑक्सीजन (O2) के प्रति संवेदनशीलता नहीं दिखाता, जिससे प्रकाश-श्वसन (Photorespiration) की हानि नहीं होती।


क्रैन्ज शारीरिकी (Kranz Anatomy)

C4 पौधों की पत्तियों में एक विशेष संरचना पाई जाती है जिसे ‘क्रैन्ज शारीरिकी’ कहते हैं। इसमें संवहन बंडल के चारों ओर पुल आच्छद (Bundle Sheath) कोशिकाओं की एक माला जैसी परत होती है।

विकल्पों का विश्लेषण:

  • फॉस्फोग्लिसरिक एसिड (PGA): यह C3 पौधों का प्रथम स्थायी उत्पाद है।

  • मैलिक एसिड: OAA बनने के बाद वह मैलिक एसिड या एस्पार्टिक एसिड में बदल जाता है, जो फिर बंडल शीथ कोशिकाओं में स्थानांतरित होता है।

  • पाइरुविक एसिड: यह मैलिक एसिड के टूटने से बनता है और वापस मेसोफिल कोशिकाओं में जाकर PEP बनाता है।

 

15. ‘क्रैन्ज शारीरिकी’ (Kranz Anatomy) किस पादप समूह की विशेषता है?

(A) C3 पौधे

(B) C4 पौधे (जैसे मक्का, गन्ना)

(C) C2 पौधे

(D) जलीय पौधे

इसका सही उत्तर (B) C4 पौधे (जैसे मक्का, गन्ना) है।

‘क्रैन्ज शारीरिकी’ C4 पादपों की पत्तियों में पाया जाने वाला एक विशिष्ट संरचनात्मक अनुकूलन है। जर्मन भाषा में ‘क्रैन्ज’ (Kranz) का अर्थ होता है ‘माला’ या ‘हार’।

क्रैन्ज शारीरिकी की मुख्य विशेषताएँ:

  • बंडल शीथ कोशिकाएँ (Bundle Sheath Cells): संवहन बंडल (Vascular Bundle) के चारों ओर बड़े आकार की कोशिकाओं की एक या कई परतें माला के रूप में व्यवस्थित होती हैं।

  • द्विरूपी हरितलवक (Dimorphic Chloroplasts): इन पौधों में दो प्रकार के क्लोरोप्लास्ट पाए जाते हैं:

    1. मेसोफिल कोशिकाएं: इनमें ग्रैना युक्त (Granal) क्लोरोप्लास्ट होते हैं।

    2. बंडल शीथ कोशिकाएं: इनमें ग्रैना रहित (Agranal) बड़े क्लोरोप्लास्ट होते हैं।

  • अंतराकोशिकीय स्थान का अभाव: बंडल शीथ कोशिकाओं के बीच खाली स्थान नहीं होता और उनकी दीवारें गैसों के लिए अपारगम्य (thick walls) होती हैं।


इसका लाभ क्या है?

यह संरचना C4 पौधों को प्रकाश-श्वसन (Photorespiration) जैसी ऊर्जा नष्ट करने वाली प्रक्रिया से बचाती है। इससे ये पौधे उच्च तापमान और तीव्र प्रकाश में भी अधिक कुशलता से प्रकाश संश्लेषण कर पाते हैं।

उदाहरण:

मक्का, गन्ना, ज्वार (Sorghum) और बाजरा।

 

16. प्रकाश श्वसन (Photorespiration) की प्रक्रिया किस कोशिकांग में संपन्न नहीं होती?

(A) क्लोरोप्लास्ट

(B) पेरोक्सीसोम

(C) माइटोकॉन्ड्रिया

(D) गोल्जी काय

इसका सही उत्तर (D) गोल्जी काय है।

प्रकाश श्वसन (Photorespiration) जिसे C2 चक्र भी कहा जाता है, एक बहुत ही विशिष्ट प्रक्रिया है जो तीन कोशिकांगों के आपसी सहयोग से संपन्न होती है। गोल्जी काय की इसमें कोई भूमिका नहीं होती है।

प्रकाश श्वसन में शामिल कोशिकांग (क्रमशः)

यह प्रक्रिया एक निश्चित क्रम में इन तीन अंगों के बीच चलती है:

  1. क्लोरोप्लास्ट (Chloroplast): यहाँ RuBisCO एंजाइम CO2 की जगह O2 से जुड़ जाता है, जिससे ‘फॉस्फोग्लाइकोलेट’ बनता है।

  2. पेरोक्सीसोम (Peroxisome): यहाँ ग्लाइकोलेट का ऑक्सीकरण होता है और ‘ग्लाइसिन’ (अमीनो एसिड) बनता है।

  3. माइटोकॉन्ड्रिया (Mitochondria): यहाँ ग्लाइसिन के दो अणु मिलकर ‘सेरीन’ बनाते हैं और CO2 बाहर निकलती है।


प्रकाश श्वसन के बारे में मुख्य तथ्य:

  • हानिकारक प्रक्रिया: इसे एक “अपव्ययी प्रक्रिया” (Wasteful process) माना जाता है क्योंकि इसमें न तो ATP बनती है और न ही शर्करा, बल्कि पहले से बनी ऊर्जा (ATP) खर्च हो जाती है।

  • शर्तें: यह उच्च तापमान, तीव्र प्रकाश और CO2 की कमी (O2 की अधिकता) में C3 पौधों में होती है।

  • C4 पौधों में अभाव: C4 पौधों (जैसे मक्का) में यह प्रक्रिया नहीं होती, इसीलिए वे अधिक उत्पादक होते हैं।

 

17. सीमाकारी कारकों का नियम (Law of Limiting Factors) किसने दिया था?

(A) इमर्सन

(B) ब्लैकमेन

(C) वारबर्ग

(D) हिल

इसका सही उत्तर (B) ब्लैकमेन (Blackman) है।

प्रकाश संश्लेषण की दर को प्रभावित करने वाले कारकों को समझाने के लिए एफ.एफ. ब्लैकमेन ने 1905 में यह महत्वपूर्ण नियम दिया था। इसके मुख्य बिंदु नीचे दिए गए हैं:

सीमाकारी कारकों का नियम (Law of Limiting Factors)

  • नियम: यदि कोई रासायनिक प्रक्रिया एक से अधिक कारकों (जैसे प्रकाश, CO2, तापमान) द्वारा प्रभावित होती है, तो उस प्रक्रिया की दर उस कारक द्वारा निर्धारित होती है जो अपनी न्यूनतम (Minimum) मात्रा में उपस्थित होता है।

  • उदाहरण: यदि किसी पौधे को पर्याप्त प्रकाश और जल मिल रहा है, लेकिन वातावरण में CO2 की मात्रा बहुत कम है, तो प्रकाश बढ़ाने पर भी प्रकाश संश्लेषण की दर नहीं बढ़ेगी। यहाँ CO2 ‘सीमाकारी कारक’ का कार्य करेगा।


अन्य विकल्पों का विवरण:

  • इमर्सन (Emerson): इन्होंने ‘इमर्सन वृद्धि प्रभाव’ (Emerson Enhancement Effect) और ‘रेड ड्रॉप’ (Red Drop) की खोज की थी, जिससे दो फोटोसिस्टम (PS-I और PS-II) की उपस्थिति सिद्ध हुई।

  • वारबर्ग (Warburg): इन्होंने बताया कि ऑक्सीजन की उच्च सांद्रता प्रकाश संश्लेषण की दर को कम कर देती है, जिसे ‘वारबर्ग प्रभाव’ कहा जाता है।

  • हिल (Hill): इन्होंने प्रकाश संश्लेषण की ‘हिल अभिक्रिया’ (प्रकाशिक अभिक्रिया) की खोज की थी, जिसमें बताया गया कि प्रकाश की उपस्थिति में क्लोरोप्लास्ट से ऑक्सीजन निकलती है।

 

18. चक्रीय फोटोफॉस्फोरिलीकरण (Cyclic Photophosphorylation) में किसका निर्माण होता है?

(A) केवल NADPH

(B) केवल ATP

(C) ATP और NADPH दोनों

(D) ग्लूकोज

इसका सही उत्तर (B) केवल ATP है।

प्रकाशिक अभिक्रिया (Light Reaction) के दौरान होने वाले चक्रीय फोटोफॉस्फोरिलीकरण की मुख्य विशेषताएँ नीचे दी गई हैं:

चक्रीय फोटोफॉस्फोरिलीकरण (Cyclic Photophosphorylation)

  • शामिल फोटोसिस्टम: इसमें केवल PS-I (P – 700) सक्रिय होता है।

  • इलेक्ट्रॉन का मार्ग: PS-I से निकला इलेक्ट्रॉन विभिन्न ग्राहियों (जैसे फेरिडॉक्सिन, साइटोक्रोम कॉम्प्लेक्स) से होता हुआ वापस PS-I के पास ही आ जाता है। इसीलिए इसे ‘चक्रीय’ कहा जाता है।

  • उत्पाद: इस चक्रीय प्रवाह के दौरान मुक्त होने वाली ऊर्जा का उपयोग केवल ATP के संश्लेषण में होता है।

  • क्या नहीं बनता: इसमें NADPH का निर्माण नहीं होता है और न ही जल का प्रकाशिक अपघटन होता है, इसलिए ऑक्सीजन (O2) भी नहीं निकलती

 


तुलना: चक्रीय बनाम अचक्रीय (Z-Scheme)

विशेषता चक्रीय (Cyclic) अचक्रीय (Non-Cyclic/Z-Scheme)
फोटोसिस्टम केवल PS-I PS-I और PS-II दोनों
मुख्य उत्पाद केवल ATP ATP और NADPH दोनों
O2 का निकलना नहीं हाँ (जल के अपघटन से)
स्थान स्ट्रोमा लेमिली (Stroma Lamellae) ग्रैना लेमिली (Grana Lamellae)

 

19. क्लोरोफिल के अणु की संरचना में कौन सा धात्विक तत्व केंद्र में होता है?

(A) लोहा (Fe)

(B) मैग्नीशियम (Mg)

(C) मैंगनीज (Mn)

(D) तांबा (Cu)

इसका सही उत्तर (B) मैग्नीशियम (Mg) है।

क्लोरोफिल (हरितलवक) की संरचना और मैग्नीशियम की भूमिका के बारे में मुख्य जानकारी नीचे दी गई है:

क्लोरोफिल की संरचना (Structure of Chlorophyll)

क्लोरोफिल के अणु की बनावट एक टैडपोल (Tadpole) की तरह होती है, जिसके मुख्य रूप से दो भाग होते हैं:

  1. पोरफाइरिन शीर्ष (Porphyrin Head): यह चार पाइरोल रिंग (Pyrrole rings) से बना एक चक्रीय ढांचा है। इस शीर्ष के बिल्कुल केंद्र में मैग्नीशियम (Mg) का एक परमाणु स्थित होता है, जो नाइट्रोजन परमाणुओं से जुड़ा रहता है।

  2. फाइटोल पूंछ (Phytol Tail): यह लंबी हाइड्रोकार्बन श्रृंखला होती है जो क्लोरोफिल को थायलाकोइड झिल्ली में स्थिर रखने में मदद करती है।


मैग्नीशियम का महत्व

  • रंग और प्रकाश अवशोषण: मैग्नीशियम प्रकाश ऊर्जा को सोखने और प्रकाश संश्लेषण की प्रक्रिया शुरू करने के लिए अनिवार्य है।

  • एंजाइम सक्रियण: यह प्रकाश संश्लेषण और श्वसन से जुड़े कई महत्वपूर्ण एंजाइमों (जैसे RuBisCO) को सक्रिय करता है।

  • कमी के लक्षण: यदि पौधे में मैग्नीशियम की कमी हो जाए, तो पुरानी पत्तियों में हरीमहीनता (Chlorosis) हो जाती है, यानी पत्तियां पीली पड़ जाती हैं।


अन्य विकल्पों की भूमिका:

  • लोहा (Fe): यह साइटोक्रोम और फेरिडॉक्सिन का हिस्सा है, जो इलेक्ट्रॉन परिवहन में मदद करते हैं।

  • मैंगनीज (Mn): यह जल के प्रकाशिक अपघटन (Photolysis) के लिए आवश्यक है।

  • तांबा (Cu): यह प्लास्टोसायनिन (Plastocyanin) नामक इलेक्ट्रॉन वाहक का घटक है।

 

20. ‘इमर्सन प्रभाव’ (Emerson Effect) ने किसकी उपस्थिति को सिद्ध किया?

(A) केवल एक फोटोसिस्टम

(B) दो फोटोसिस्टम (PS-I और PS-II)

(C) फोटोफॉस्फोरिलीकरण

(D) अंधकार अभिक्रिया

इसका सही उत्तर (B) दो फोटोसिस्टम (PS-I और PS-II) है।

रॉबर्ट इमर्सन ने अपने प्रयोगों के माध्यम से प्रकाश संश्लेषण की क्रियाविधि में एक क्रांतिकारी खोज की थी। इसके पीछे के दो मुख्य प्रभाव नीचे दिए गए हैं:

1. रेड ड्रॉप (Red Drop – लाल पतन)

इमर्सन ने देखा कि यदि पौधों को केवल 680 nm (लाल प्रकाश) से अधिक लंबी तरंगदैर्ध्य वाला प्रकाश दिया जाता है, तो प्रकाश संश्लेषण की दर में अचानक भारी गिरावट आ जाती है। इसे ‘रेड ड्रॉप’ कहा गया।

2. इमर्सन वृद्धि प्रभाव (Emerson Enhancement Effect)

जब उन्होंने पौधे को एक साथ दो अलग-अलग तरंगदैर्ध्य का प्रकाश दिया—एक कम तरंगदैर्ध्य (जैसे 650-660 nm) और एक उच्च तरंगदैर्ध्य (700 nm)—तो उन्होंने पाया कि प्रकाश संश्लेषण की कुल दर, दोनों के अलग-अलग योग से भी कहीं अधिक थी।

निष्कर्ष

इस वृद्धि प्रभाव (Enhancement) ने यह सिद्ध किया कि:

  • प्रकाश संश्लेषण में दो अलग-अलग वर्णक तंत्र (Pigment Systems) एक साथ मिलकर काम करते हैं।

  • इन्हें बाद में PS-I (700 nm पर सक्रिय) और PS-II (680 nm पर सक्रिय) नाम दिया गया।

  • जब दोनों सिस्टम एक साथ काम करते हैं, तभी प्रकाश संश्लेषण की दर अधिकतम होती है।


फोटोसिस्टम की संक्षिप्त जानकारी:

फोटोसिस्टम मुख्य वर्णक (Reaction Center) तरंगदैर्ध्य (Absorption Peak)
PS-I P-700 700 nm
PS-II P-680 680 nm

 

21. विसरण दाब न्यूनता (DPD) का मान एक पूर्णतः स्फीत (Turgid) कोशिका के लिए कितना होगा?

(A) OP के बराबर

(B) शून्य

(C) अनंत

(D) ऋणात्मक

इसका सही उत्तर (B) शून्य है।

पादप कोशिका की जल-संबंधी अवस्था को समझने के लिए विसरण दाब न्यूनता (DPD) एक महत्वपूर्ण कारक है। इसके पीछे का वैज्ञानिक कारण नीचे दिया गया है:

DPD (Diffusion Pressure Deficit)

इसे “कोशिका की प्यास” (Thirst of cell) भी कहा जाता है। इसका मुख्य सूत्र है:

$$DPD = OP – TP$$

जहाँ:

  • OP (Osmotic Pressure): परासरण दाब

  • TP (Turgor Pressure): स्फीति दाब

पूर्णतः स्फीत (Fully Turgid) कोशिका की स्थिति:

जब एक कोशिका पूरी तरह से पानी सोख लेती है, तो वह फूल जाती है। इस स्थिति में:

  1. अंदर से बाहर की ओर लगने वाला दाब (TP) इतना बढ़ जाता है कि वह बाहर से अंदर आने वाले परासरण दाब (OP) के बिल्कुल बराबर हो जाता है।

  2. अर्थात: OP = TP

गणना:

यदि हम सूत्र में मान रखें:

$$DPD = OP – OP$$
$$DPD = 0$$

अतः, एक पूर्णतः स्फीत कोशिका में और अधिक पानी सोखने की क्षमता नहीं रहती, इसलिए उसका DPD शून्य होता है।


अन्य स्थितियाँ:

  • श्लथ कोशिका (Flaccid Cell): यहाँ TP = 0 होता है, इसलिए DPD = OP होता है।

  • जीवद्रव्य कुंचित कोशिका (Plasmolysed Cell): यहाँ TP ऋणात्मक होता है, इसलिए DPD = OP + TP (DPD सबसे अधिक) होता है।

 

22. द्वार कोशिकाएं (Guard Cells) अन्य एपिडर्मल कोशिकाओं से किस प्रकार भिन्न होती हैं?

(A) इनमें केंद्रक नहीं होता

(B) इनमें क्लोरोप्लास्ट होता है

(C) इनकी भित्ति पतली होती है

(D) ये मृत होती हैं

सही उत्तर (B) इनमें क्लोरोप्लास्ट होता है है।

व्याख्या:

पौधों की बाहरी परत (एपिडर्मिस) में द्वार कोशिकाएं (Guard Cells) विशिष्ट कोशिकाएं होती हैं जो रंध्र (Stomata) को घेरे रहती हैं। ये अन्य एपिडर्मल कोशिकाओं से निम्नलिखित कारणों से भिन्न होती हैं:

  • क्लोरोप्लास्ट की उपस्थिति: द्वार कोशिकाओं में क्लोरोप्लास्ट (Chloroplasts) पाए जाते हैं, जो प्रकाश संश्लेषण (Photosynthesis) की प्रक्रिया में सहायक होते हैं। इसके विपरीत, सामान्य एपिडर्मल कोशिकाओं में आमतौर पर क्लोरोप्लास्ट नहीं होते।

  • आकार: ये आमतौर पर सेम के बीज (Bean shaped) या डंबल के आकार की होती हैं।

  • कोशिका भित्ति: इनकी आंतरिक भित्ति (रंध्र की ओर वाली) मोटी और लचीली होती है, जबकि बाहरी भित्ति पतली होती है। यही संरचना रंध्रों के खुलने और बंद होने में मदद करती है।

23. अचक्रीय फोटोफॉस्फोरिलीकरण (Non-cyclic/Z-scheme) का अंतिम इलेक्ट्रॉन ग्राही कौन है?

(A) साइटोक्रोम

(B) NADP+

(C) प्लास्टोसाइनिन

(D) फेरेडॉक्सिन

सही उत्तर (B) NADP+ है।

व्याख्या:

अचक्रीय फोटोफॉस्फोरिलीकरण (Non-cyclic Photophosphorylation), जिसे Z-स्कीम भी कहा जाता है, प्रकाश संश्लेषण की प्रकाश-अभिक्रिया का एक महत्वपूर्ण चरण है। इसमें इलेक्ट्रॉनों का प्रवाह एक रैखिक मार्ग में होता है:

  • प्रक्रिया: जल के प्रकाश-अपघटन (Photolysis of water) से निकलने वाले इलेक्ट्रॉन सबसे पहले PS-II (P680) द्वारा ग्रहण किए जाते हैं।

  • प्रवाह: यहाँ से इलेक्ट्रॉन विभिन्न ग्राहियों जैसे फियोफाइटिन, साइटोक्रोम कॉम्प्लेक्स और प्लास्टोसाइनिन से होते हुए PS-I (P700) तक पहुँचते हैं।

  • अंतिम चरण: PS-I से उत्तेजित होकर इलेक्ट्रॉन फेरेडॉक्सिन (Fd) के पास जाते हैं। अंत में, NADP+ रिडक्टेस एंजाइम की उपस्थिति में ये इलेक्ट्रॉन NADP+ को प्रदान कर दिए जाते हैं, जिससे वह अपचयित (Reduce) होकर NADPH बना लेता है।

चूँकि इलेक्ट्रॉन वापस अपने स्रोत (PS-II) पर नहीं लौटते और अंत में NADP+ द्वारा ग्रहण कर लिए जाते हैं, इसलिए इसे ‘अचक्रीय’ प्रवाह कहा जाता है।

24. प्रकाश संश्लेषण में प्रकाश की कौन सी तरंगदैर्ध्य सबसे अधिक प्रभावी होती है?

(A) हरी

(B) लाल

(C) बैंगनी

(D) पीली

सही उत्तर (B) लाल है।

व्याख्या:

प्रकाश संश्लेषण (Photosynthesis) की दर दृश्य प्रकाश (Visible light) के अलग-अलग रंगों या तरंगदैर्ध्य (Wavelength) पर निर्भर करती है। क्लोरोफिल अणु मुख्य रूप से नीले और लाल रंग के प्रकाश को अवशोषित करते हैं।

  • लाल प्रकाश (Red Light): लाल रंग की तरंगदैर्ध्य (लगभग 600-700 nm) प्रकाश संश्लेषण के लिए सबसे अधिक प्रभावी मानी जाती है। क्लोरोफिल-a और क्लोरोफिल-b इस क्षेत्र में ऊर्जा का अवशोषण बहुत कुशलता से करते हैं, जिससे प्रकाश संश्लेषण की दर अधिकतम होती है।

  • नीला प्रकाश (Blue Light): नीले प्रकाश में अवशोषण तो बहुत अधिक होता है, लेकिन ऊर्जा के कुछ हिस्से के ऊष्मा के रूप में नष्ट होने के कारण यह लाल प्रकाश की तुलना में थोड़ा कम प्रभावी होता है।

  • हरा प्रकाश (Green Light): पौधे हरे प्रकाश को परावर्तित (Reflect) कर देते हैं, जिसके कारण वे हमें हरे दिखाई देते हैं। इसलिए, हरे प्रकाश में प्रकाश संश्लेषण की दर न्यूनतम होती है।

25. रुबिस्को (RuBisCO) एंजाइम अपनी ऑक्सीजनकारी (Oxygenase) गतिविधि कब प्रदर्शित करता है?

(A) CO2 की उच्च सांद्रता पर

(B) O2 की उच्च और CO2 की निम्न सांद्रता पर

(C) अंधेरे में

(D) निम्न तापमान पर

सही उत्तर (B) O2 की उच्च और CO2 की निम्न सांद्रता पर है।

व्याख्या:

रुबिस्को (RuBisCO) का पूरा नाम ‘रिबुलोज-1,5-बिस्फोस्फेट कार्बोक्सिलेज-ऑक्सीजनेज’ है। जैसा कि इसके नाम से पता चलता है, इसमें कार्बोक्सिलेज और ऑक्सीजनेज दोनों प्रकार की गतिविधियां करने की क्षमता होती है।

  • प्रतिस्पर्धा: रुबिस्को की सक्रिय साइट के लिए CO2 और O2 के बीच प्रतिस्पर्धा होती है। सामान्य परिस्थितियों में इसकी बंधुता (Affinity) CO2 के लिए अधिक होती है।

  • ऑक्सीजनेज गतिविधि: जब वातावरण में ऑक्सीजन (O2) की सांद्रता बढ़ जाती है और कार्बन डाइऑक्साइड (CO2) की सांद्रता कम हो जाती है (अक्सर उच्च तापमान और तीव्र प्रकाश के कारण रंध्र बंद होने पर), तब रुबिस्को CO2 के बजाय O2 से जुड़ जाता है।

  • प्रकाश-श्वसन (Photorespiration): इस स्थिति में रुबिस्को RuBP के साथ O2 को जोड़कर प्रकाश-श्वसन की प्रक्रिया शुरू करता है, जिसमें CO2 का स्थिरीकरण नहीं होता और ऊर्जा की हानि होती है। यह मुख्य रूप से C3 पौधों में देखा जाता है।

26. विलेय विभव (Ψs) का मान हमेशा कैसा होता है?

(A) धनात्मक

(B) ऋणात्मक

(C) शून्य

(D) विलेय की मात्रा पर निर्भर (धनात्मक या ऋणात्मक)

सही उत्तर (B) ऋणात्मक है।

व्याख्या:

जल विभव ($\Psi_w$) को प्रभावित करने वाले कारकों में विलेय विभव ($\Psi_s$) सबसे महत्वपूर्ण है। इसके ऋणात्मक होने के मुख्य कारण निम्नलिखित हैं:

  • मुक्त ऊर्जा में कमी: शुद्ध जल का जल विभव अधिकतम यानी शून्य होता है। जब शुद्ध जल में कोई विलेय (जैसे नमक या चीनी) घोला जाता है, तो जल के अणुओं की मुक्त ऊर्जा और उनकी सांद्रता कम हो जाती है।

  • परिभाषा: विलेय मिलाने के कारण जल विभव में आने वाली इस कमी को ही विलेय विभव ($\Psi_s$) कहते हैं। चूंकि यह शून्य से कम हो जाता है, इसलिए इसका मान हमेशा ऋणात्मक (Negative) होता है।

  • सांद्रता का प्रभाव: आप विलेय की मात्रा जितनी अधिक बढ़ाएंगे, $\Psi_s$ का मान उतना ही अधिक ऋणात्मक होता जाएगा।


एक महत्वपूर्ण सूत्र:

किसी तंत्र का कुल जल विभव ($\Psi_w$) निम्नलिखित समीकरण द्वारा दर्शाया जाता है:

$$\Psi_w = \Psi_s + \Psi_p$$

(जहाँ $\Psi_p$ दाब विभव है)

27. ‘अंतःशोषण’ (Imbibition) की प्रक्रिया के लिए क्या आवश्यक है?

(A) अर्ध-पारगम्य झिल्ली

(B) सोखने वाले और तरल के बीच आकर्षण

(C) ऊर्जा (ATP)

(D) केवल जीवित कोशिका

सही उत्तर (B) सोखने वाले और तरल के बीच आकर्षण है।

व्याख्या:

अंतःशोषण (Imbibition) एक विशेष प्रकार का विसरण (Diffusion) है, जिसमें ठोस पदार्थों (Colloids) द्वारा पानी का अवशोषण किया जाता है, जिससे उनके आयतन में उल्लेखनीय वृद्धि होती है। इसके लिए दो शर्तें सबसे महत्वपूर्ण हैं:

  • आकर्षण (Affinity): सोखने वाले पदार्थ (Imbibant) और तरल (Liquid) के बीच एक मजबूत आकर्षण होना चाहिए। उदाहरण के लिए, सूखे बीज या लकड़ी और पानी के बीच गहरा आकर्षण होता है।

  • जल विभव प्रवणता (Water Potential Gradient): सोखने वाले पदार्थ और अवशोषित होने वाले तरल के बीच जल विभव का अंतर होना आवश्यक है।


मुख्य बिंदु:

  • इसमें अर्ध-पारगम्य झिल्ली की आवश्यकता नहीं होती (यह परासरण/Osmosis से इसे अलग बनाता है)।

  • यह एक भौतिक प्रक्रिया है, इसलिए इसके लिए जीवित कोशिका का होना अनिवार्य नहीं है (जैसे सूखी लकड़ी का फूलना)।

  • अंतःशोषण के दौरान ऊष्मा (Heat of wetting) मुक्त होती है।

28. जाइलम में जल स्तंभ के टूटने को रोकने वाला मुख्य बल कौन सा है?

(A) मूल दाब

(B) जल का उच्च तनाव सामर्थ्य (Tensile Strength)

(C) गुरुत्वाकर्षण

(D) परासरण दाब

सही उत्तर (B) जल का उच्च तनाव सामर्थ्य (Tensile Strength) है।

व्याख्या:

जाइलम (Xylem) के माध्यम से जल का ऊपर चढ़ना (Rasaarohan) मुख्य रूप से जल के अणुओं के भौतिक गुणों पर निर्भर करता है। जल स्तंभ (Water Column) को टूटने से बचाने में निम्नलिखित बल कार्य करते हैं:

  • तनाव सामर्थ्य (Tensile Strength): यह जल की वह क्षमता है जिससे वह खिंचाव के विरुद्ध खड़ा रहता है। जल में यह सामर्थ्य बहुत अधिक होता है, जिससे जाइलम की पतली वाहिकाओं में जल की एक अटूट धारा बनी रहती है।

  • संसंजन (Cohesion): जल के अणुओं के बीच आपसी आकर्षण, जो उन्हें एक साथ जोड़े रखता है।

  • आसंजन (Adhesion): जल के अणुओं का जाइलम की दीवारों (Tracheary elements) के साथ आकर्षण।

  • वाष्पोत्सर्जन खिंचाव (Transpiration Pull): पत्तियों से पानी उड़ने पर एक खिंचाव पैदा होता है, जिसे उच्च तनाव सामर्थ्य के कारण जल स्तंभ बिना टूटे सहन कर लेता है।


मुख्य बिंदु:

  • मूल दाब (Root Pressure) केवल कम ऊंचाई तक पानी पहुँचाने में सहायक होता है।

  • गुरुत्वाकर्षण जल स्तंभ को नीचे खींचने का प्रयास करता है, जबकि तनाव सामर्थ्य इसे ऊपर बनाए रखता है।

29. ‘फ्लैक्सिड’ (Flaccid) कोशिका में TP (Turgor Pressure) का मान कितना होता है?

(A) अधिकतम

(B) शून्य

(C) ऋणात्मक

(D) OP के बराबर

सही उत्तर (B) शून्य है।

व्याख्या:

एक ‘फ्लैक्सिड’ (Flaccid) या श्लथ कोशिका वह होती है जिसे एक ऐसे घोल (Isotonic solution) में रखा गया हो जहाँ कोशिका के अंदर और बाहर का परासरण दाब समान हो। इसकी मुख्य विशेषताएं निम्नलिखित हैं:

  • स्फीति दाब (Turgor Pressure – TP): जब कोशिका की दीवार पर अंदर से कोई दबाव नहीं पड़ता, तो TP = 0 होता है। फ्लैक्सिड अवस्था में कोशिका झिल्ली दीवार को नहीं छूती है, इसलिए कोई दबाव उत्पन्न नहीं होता।

  • भित्ति दाब (Wall Pressure – WP): चूंकि TP और WP हमेशा बराबर होते हैं, इसलिए इस स्थिति में WP भी शून्य होता है।

  • विसरण दाब न्यूनता (DPD): इस स्थिति में DPD, परासरण दाब (OP) के बराबर होता है क्योंकि सूत्र DPD = OP – TP के अनुसार, यदि TP = 0 है, तो DPD = OP होगा।


तुलना के लिए:

  • स्फीत (Turgid) कोशिका: यहाँ TP अधिकतम होता है।

  • द्रव्यकुंचित (Plasmolyzed) कोशिका: यहाँ TP का मान ऋणात्मक (Negative) हो सकता है।

30. निम्नलिखित में से कौन सा C4 पौधा है?

(A) मक्का

(B) चावल

(C) गेहूँ

(D) आलू

सही उत्तर (A) मक्का है।

व्याख्या:

पौधों को उनके कार्बन डाइऑक्साइड (CO2) स्थिरीकरण (Fixation) के मार्ग के आधार पर C3 और C4 समूहों में बांटा गया है। मक्का एक आदर्श C4 पौधा है क्योंकि:

  • क्रैन्ज शारीरिकी (Kranz Anatomy): मक्का की पत्तियों में संवहन बंडल (Vascular bundles) के चारों ओर बड़े बंडल शीथ (Bundle sheath) कोशिकाएं होती हैं।

  • उच्च दक्षता: C4 पौधे उच्च तापमान और तीव्र प्रकाश में भी बेहतर प्रकाश संश्लेषण करते हैं और इनमें जल की हानि कम होती है।

  • प्रथम उत्पाद: इसमें CO2 स्थिरीकरण का पहला स्थिर उत्पाद 4-कार्बन वाला अम्ल, ऑक्सेलोएसिटिक एसिड (OAA) होता है।


अन्य विकल्पों का वर्गीकरण:

  • चावल, गेहूँ और आलू: ये सभी C3 पौधे हैं। इनमें प्रकाश-श्वसन (Photorespiration) की प्रक्रिया होती है, जिससे इनकी उत्पादकता C4 पौधों की तुलना में कम हो सकती है।

31. C3 चक्र का प्रथम स्थायी उत्पाद 3-फॉस्फोग्लिसरिक एसिड (3-PGA) कितने कार्बन वाला अणु है?

(A) 2

(B) 3

(C) 4

(D) 5

सही उत्तर (B) 3 है।

व्याख्या:

C3 चक्र, जिसे केल्विन चक्र (Calvin Cycle) भी कहा जाता है, प्रकाश संश्लेषण की अंधकार-अभिक्रिया का मुख्य मार्ग है। इसे C3 चक्र इसलिए कहा जाता है क्योंकि:

  • प्रथम स्थायी उत्पाद: जब कार्बन डाइऑक्साइड (CO2), 5-कार्बन वाले ग्राही RuBP (रिबुलोज-1,5-बिस्फोस्फेट) के साथ जुड़ती है, तो सबसे पहले 3-फॉस्फोग्लिसरिक एसिड (3-PGA) का निर्माण होता है।

  • कार्बन की संख्या: 3-PGA एक 3-कार्बन वाला अणु है। यही कारण है कि इस पथ को C3 पथ और इन पौधों को C3 पौधे कहा जाता है।

  • एंजाइम: इस प्रक्रिया को रुबिस्को (RuBisCO) एंजाइम उत्प्रेरित करता है।


अन्य महत्वपूर्ण जानकारी:

  • C4 चक्र: इसमें प्रथम स्थायी उत्पाद 4-कार्बन वाला ऑक्सेलोएसिटिक एसिड (OAA) होता है।

  • RuBP: यह CO2 का प्राथमिक ग्राही है, जो स्वयं 5-कार्बन वाला होता है।

32. प्रकाश संश्लेषण के दौरान ATP के निर्माण की प्रक्रिया क्या कहलाती है?

(A) फॉस्फोरिलीकरण

(B) फोटोफॉस्फोरिलीकरण

(C) ऑक्सीकारी फॉस्फोरिलीकरण

(D) ग्लाइकोलिसिस

सही उत्तर (B) फोटोफॉस्फोरिलीकरण है।

व्याख्या:

प्रकाश संश्लेषण की प्रकाश-अभिक्रिया के दौरान सूर्य के प्रकाश की उपस्थिति में ADP और अकार्बनिक फॉस्फेट  से ATP बनने की प्रक्रिया को फोटोफॉस्फोरिलीकरण (Photophosphorylation) कहा जाता है।

  • प्रक्रिया: जब क्लोरोफिल अणु प्रकाश को अवशोषित करते हैं, तो इलेक्ट्रॉन उत्तेजित होकर एक परिवहन तंत्र (Electron Transport System) से गुजरते हैं। इस दौरान मुक्त होने वाली ऊर्जा का उपयोग ATP के संश्लेषण के लिए किया जाता है।

  • प्रकार: यह दो प्रकार का होता है:

    1. अचक्रीय (Non-cyclic): इसमें ATP और NADPH दोनों बनते हैं।

    2. चक्रीय (Cyclic): इसमें केवल ATP का निर्माण होता है।


अन्य विकल्पों का अर्थ:

  • फॉस्फोरिलीकरण: किसी अणु में फॉस्फेट समूह जोड़ने की सामान्य प्रक्रिया।

  • ऑक्सीकारी फॉस्फोरिलीकरण (Oxidative Phosphorylation): यह श्वसन (Respiration) के दौरान माइटोकॉन्ड्रिया में ATP बनने की प्रक्रिया है।

  • ग्लाइकोलिसिस: ग्लूकोज के टूटने की पहली अवस्था, जो कोशिका द्रव्य में होती है।

33. PS-II से निकलने वाले इलेक्ट्रॉनों की कमी को कौन पूरा करता है?

(A) CO2

(B) जल का विखंडन 

(C) PS-I

(D) ग्लूकोज

सही उत्तर (B) जल का विखंडन (Photolysis of Water) है।

व्याख्या:

प्रकाश संश्लेषण की अचक्रीय प्रक्रिया (Z-scheme) के दौरान, जब PS-II (फोटोसिस्टम II) पर प्रकाश पड़ता है, तो इसके क्लोरोफिल अणु उत्तेजित होकर इलेक्ट्रॉन त्याग देते हैं। इन निरंतर निकलने वाले इलेक्ट्रॉनों की कमी को पूरा करना अनिवार्य होता है, जो ‘जल के विखंडन’ द्वारा संभव होता है:

  • प्रक्रिया: प्रकाश की उपस्थिति में जल  के अणु टूटते हैं, जिससे प्रोटॉन, इलेक्ट्रॉन  और ऑक्सीजन मुक्त होती है।

    $$2H_2O \rightarrow 4H^+ + 4e^- + O_2$$
  • इलेक्ट्रॉन की आपूर्ति: जल के टूटने से निकलने वाले ये इलेक्ट्रॉन सीधे PS-II को दे दिए जाते हैं, जिससे वह फिर से उत्तेजित होने के लिए तैयार हो जाता है।

  • स्थान: यह प्रक्रिया थाइलाकोइड झिल्ली के अंदर की ओर (Lumen) होती है।

  • महत्व: इसी प्रक्रिया के कारण प्रकाश संश्लेषण में ऑक्सीजन एक उप-उत्पाद (By-product) के रूप में बाहर निकलती है।


अन्य जानकारी:

  • PS-I को इलेक्ट्रॉन PS-II से परिवहन श्रृंखला के माध्यम से प्राप्त होते हैं।

  • CO2 का उपयोग बाद में ‘अंधकार अभिक्रिया’ (Calvin Cycle) में शर्करा बनाने के लिए किया जाता है।

34. केल्विन चक्र के किस चरण में ATP और NADPH दोनों का उपयोग होता है ?

(A) कार्बोक्सिलीकरण

(B) अपचयन (Reduction)

(C) पुनरुद्भवन (Regeneration)

(D) उपरोक्त सभी

सही उत्तर (B) अपचयन (Reduction) है।

व्याख्या:

केल्विन चक्र (C3 चक्र) तीन मुख्य चरणों में पूरा होता है, लेकिन ATP और NADPH दोनों का एक साथ उपयोग केवल अपचयन चरण में होता है:

  • अपचयन (Reduction): इस चरण में 3-PGA के अणुओं का अपचयन होकर ‘ट्रायोज फॉस्फेट’ (G3P) बनता है। यहाँ प्रति CO2 अणु के स्थिरीकरण के लिए 2 ATP और 2 NADPH का उपयोग किया जाता है।

  • कार्बोक्सिलीकरण (Carboxylation): यह पहला चरण है जहाँ CO2 का स्थिरीकरण होता है। इस चरण में किसी ऊर्जा (ATP/NADPH) की आवश्यकता नहीं होती।

  • पुनरुद्भवन (Regeneration): CO2 ग्राही RuBP को वापस बनाने के लिए इस चरण में केवल ATP का उपयोग होता है (NADPH का नहीं)।


कुल गणना (प्रति CO2 अणु):

  • अपचयन में: 2 ATP + 2 NADPH

  • पुनरुद्भवन में: 1 ATP

  • कुल: केल्विन चक्र में एक CO2 अणु को स्थिर करने के लिए कुल 3 ATP और 2 NADPH खर्च होते हैं।

35. C4 पौधों में प्रकाश श्वसन (Photorespiration) क्यों नहीं होता ?

(A) क्योंकि इनमें रुबिस्को नहीं होता

(B) क्योंकि इनमें CO2 सांद्रता बढ़ाने की प्रणाली होती है

(C) क्योंकि ये ठंडे स्थानों पर उगते हैं

(D) इनमें क्लोरोफिल कम होता है

सही उत्तर (B) क्योंकि इनमें CO2 सांद्रता बढ़ाने की प्रणाली होती है है।

व्याख्या:

$C_4$ पौधों (जैसे मक्का, गन्ना) ने प्रकाश-श्वसन (Photorespiration) जैसी ऊर्जा बर्बाद करने वाली प्रक्रिया से बचने के लिए एक विशेष तंत्र विकसित किया है:

  • बंडल शीथ कोशिकाओं में $CO_2$ का जमाव: $C_4$ पौधों में $CO_2$ का प्राथमिक स्थिरीकरण पर्णमध्योतक (Mesophyll) कोशिकाओं में होता है, जहाँ से इसे 4-कार्बन वाले अम्ल के रूप में बंडल शीथ (Bundle Sheath) कोशिकाओं में भेजा जाता है।

  • उच्च सांद्रता: बंडल शीथ कोशिकाओं में यह 4-कार्बन अम्ल टूटकर $CO_2$ मुक्त करता है। इसके परिणामस्वरूप रुबिस्को (RuBisCO) एंजाइम के आसपास $CO_2$ की सांद्रता बहुत अधिक हो जाती है।

  • रुबिस्को की भूमिका: $CO_2$ की उच्च सांद्रता यह सुनिश्चित करती है कि रुबिस्को केवल कार्बोक्सिलेज के रूप में कार्य करे और ऑक्सीजन ($O_2$) से न जुड़े। इससे प्रकाश-श्वसन की संभावना समाप्त हो जाती है और पौधों की उत्पादकता बढ़ जाती है।


मुख्य अंतर:

  • $C_3$ पौधों में रुबिस्को $O_2$ के संपर्क में आ जाता है, जिससे प्रकाश-श्वसन होता है।

  • $C_4$ पौधों में ‘क्रैन्ज शारीरिकी’ के कारण रुबिस्को $O_2$ से सुरक्षित रहता है।

36. प्रकाश संश्लेषण की ‘हिल अभिक्रिया’ (Hill Reaction) का अर्थ है:

(A) CO2 का स्थिरीकरण

(B) प्रकाश की उपस्थिति में जल का अपघटन और O2 का निकलना

(C) ग्लूकोज का निर्माण

(D) स्टार्च का संचय

सही उत्तर (B) प्रकाश की उपस्थिति में जल का अपघटन और $O_2$ का निकलना है।

व्याख्या:

रॉबिन हिल (Robin Hill) ने 1937 में यह सिद्ध किया था कि प्रकाश संश्लेषण में ऑक्सीजन का निकलना प्रकाश पर निर्भर करता है और यह $CO_2$ के स्थिरीकरण (Reduction) से स्वतंत्र प्रक्रिया है।

  • हिल अभिक्रिया: इसे प्रकाश-अभिक्रिया (Light Reaction) भी कहा जाता है। इसमें पृथक किए गए क्लोरोप्लास्ट को जब प्रकाश और उपयुक्त इलेक्ट्रॉन ग्राही (जैसे फेरिक साल्ट) की उपस्थिति में रखा जाता है, तो वे जल का अपघटन करके ऑक्सीजन मुक्त करते हैं।

  • निष्कर्ष: इस प्रयोग ने स्पष्ट किया कि प्रकाश संश्लेषण के दौरान निकलने वाली ऑक्सीजन ($O_2$), जल ($H_2O$) से आती है, न कि कार्बन डाइऑक्साइड ($CO_2$) से।

  • स्थान: यह प्रक्रिया क्लोरोप्लास्ट के ग्रैना (Grana) या थाइलाकोइड झिल्ली में संपन्न होती है।


अन्य विकल्पों का विश्लेषण:

  • $CO_2$ का स्थिरीकरण और ग्लूकोज निर्माण: ये ‘अंधकार अभिक्रिया’ (Dark Reaction) या केल्विन चक्र के भाग हैं, जो स्ट्रोमा (Stroma) में होते हैं।

  • स्टार्च का संचय: यह प्रकाश संश्लेषण का अंतिम परिणाम है, प्रक्रिया नहीं।

37. वाष्पोत्सर्जन को कम करने के लिए पत्तियों पर पाया जाने वाला मोमी आवरण क्या कहलाता है?

(A) एपिडर्मिस

(B) क्यूटिकल

(C) एंडोडर्मिस

(D) मेसोफिल

सही उत्तर (B) क्यूटिकल है।

व्याख्या:

पौधों में जल की हानि को नियंत्रित करने के लिए पत्तियों की बाहरी सतह पर एक विशेष अनुकूलन पाया जाता है:

  • क्यूटिकल (Cuticle): यह एपिडर्मिस के ऊपर स्थित एक मोमी (Waxy), जल-रोधी परत होती है। यह मुख्य रूप से क्यूटिन नामक वसायुक्त पदार्थ से बनी होती है।

  • कार्य: इसका प्राथमिक कार्य वाष्पोत्सर्जन (Transpiration) की दर को कम करना है। मरुस्थलीय पौधों (Xerophytes) में यह परत काफी मोटी होती है ताकि वे पानी की कमी वाले वातावरण में जीवित रह सकें।

  • रक्षा: यह न केवल पानी के वाष्पीकरण को रोकती है, बल्कि पत्ती को यांत्रिक क्षति और रोगजनकों (Pathogens) के प्रवेश से भी बचाती है।


अन्य विकल्पों का अर्थ:

  • एपिडर्मिस: यह पौधे के अंगों की सबसे बाहरी कोशिकीय परत है।

  • एंडोडर्मिस: यह जड़ और तने के आंतरिक भाग (Cortex और Stele के बीच) में पाई जाने वाली परत है।

  • मेसोफिल: यह पत्ती का आंतरिक ऊतक है जहाँ प्रकाश संश्लेषण होता है।

38. स्टोमेटा के बंद होने के लिए कौन सा पादप हार्मोन जिम्मेदार है?

(A) ऑक्सिन

(B) एब्सिसिक एसिड (ABA)

(C) साइटोकाइनिन

(D) जिबरेलिन

सही उत्तर (B) एब्सिसिक एसिड (ABA) है।

व्याख्या:

एब्सिसिक एसिड (Abscisic Acid) को ‘तनाव हार्मोन’ (Stress Hormone) भी कहा जाता है क्योंकि यह प्रतिकूल पर्यावरणीय स्थितियों में पौधे की रक्षा करता है।

  • स्टोमेटा पर प्रभाव: जब पौधे में पानी की कमी होती है, तो पत्तियों में ABA का तेजी से संश्लेषण होता है। यह हार्मोन द्वार कोशिकाओं (Guard cells) की झिल्ली की पारगम्यता को बदल देता है, जिससे उनसे पोटेशियम आयन ($K^+$) बाहर निकलने लगते हैं।

  • परिणाम: आयनों के बाहर निकलने से द्वार कोशिकाओं का जल विभव बढ़ जाता है और पानी बाहर निकल जाता है, जिससे कोशिकाएं ‘फ्लैक्सिड’ (ढीली) हो जाती हैं और रंध्र (Stomata) बंद हो जाते हैं।

  • महत्व: यह प्रक्रिया वाष्पोत्सर्जन (Transpiration) को रोककर पानी बचाने में मदद करती है।


अन्य विकल्पों का कार्य:

  • ऑक्सिन: कोशिका वृद्धि और शीर्ष प्रमुखता (Apical dominance) के लिए।

  • साइटोकाइनिन: कोशिका विभाजन को बढ़ावा देता है और रंध्रों को खोलने में सहायक हो सकता है।

  • जिबरेलिन: तने की लंबाई बढ़ाने और बीज अंकुरण के लिए।

39. जल विभव (Ψw) का सूत्र क्या है?

(A) Ψw = Ψs + Ψp

(B) Ψw = Ψs – Ψp

(C) Ψw = OP + TP

(D) Ψw = OP – TP

सही उत्तर (A) $\Psi_w = \Psi_s + \Psi_p$ है।

व्याख्या:

जल विभव (Water Potential – $\Psi_w$) एक अवधारणा है जिसका उपयोग जल की गति की दिशा को समझने के लिए किया जाता है। इसके मुख्य घटक निम्नलिखित हैं:

  • $\Psi_s$ (विलेय विभव): यह विलेय (Solute) मिलाने पर जल विभव में होने वाली कमी को दर्शाता है। यह हमेशा ऋणात्मक होता है।

  • $\Psi_p$ (दाब विभव): जब पानी कोशिका में प्रवेश करता है, तो यह कोशिका भित्ति पर दबाव डालता है, जिसे दाब विभव कहते हैं। यह आमतौर पर धनात्मक होता है।

  • समीकरण: किसी भी तंत्र का कुल जल विभव इन दोनों बलों का योग होता है:

    $$\Psi_w = \Psi_s + \Psi_p$$

मुख्य बिंदु:

  • शुद्ध जल का जल विभव अधिकतम यानी शून्य होता है।

  • जल हमेशा उच्च जल विभव से निम्न जल विभव की ओर गति करता है।

  • विकल्प (D) में दिया गया $DPD = OP – TP$ पुराने समय में उपयोग किया जाने वाला शब्द था, जिसे अब जल विभव की शब्दावली में बदल दिया गया है ($DPD = -\Psi_w$)।

 

40. ‘सामूहिक प्रवाह परिकल्पना’ (Mass Flow Hypothesis) किसने दी थी ?

(A) डिक्सन

(B) अर्नस्ट मुंच (Ernst Munch)

(C) स्टीफन हेल्स

(D) प्रीस्टले

सही उत्तर (B) अर्नस्ट मुंच (Ernst Munch) है।

व्याख्या:

सामूहिक प्रवाह परिकल्पना (Mass Flow or Pressure Flow Hypothesis) पौधों में भोजन (शर्करा) के परिवहन की सबसे मान्य प्रक्रिया है।

  • सिद्धांत: मुंच के अनुसार, भोजन का परिवहन ‘स्रोत’ (Source – जहाँ भोजन बनता है, जैसे पत्तियाँ) से ‘कुंड’ (Sink – जहाँ भोजन का उपयोग या भंडारण होता है, जैसे जड़ या फल) की ओर होता है।

  • प्रक्रिया: पत्तियों में शर्करा की उच्च सांद्रता होने से वहां परासरण दाब बढ़ जाता है, जिससे पानी फ्लोएम (Phloem) में प्रवेश करता है। इससे उत्पन्न धनात्मक जलस्थैतिक दाब (Positive Hydrostatic Pressure) के कारण भोजन का घोल सामूहिक रूप से कम दबाव वाले क्षेत्रों की ओर बहने लगता है।

  • प्रतिपादन: अर्नस्ट मुंच ने इसे 1930 में प्रस्तावित किया था।


अन्य विकल्पों का विवरण:

  • डिक्सन (Dixon): इन्होंने ‘संसंजन-तनाव सिद्धांत’ (Cohesion-Tension Theory) दिया था, जो जाइलम में जल के परिवहन से संबंधित है।

  • स्टीफन हेल्स (Stephen Hales): इन्हें ‘पादप शरीर क्रिया विज्ञान’ (Plant Physiology) का जनक कहा जाता है।

  • प्रीस्टले (Priestley): इन्होंने प्रकाश संश्लेषण में ऑक्सीजन की भूमिका और हवा के शुद्धिकरण की खोज की थी।

41. चक्रीय फोटोफॉस्फोरिलीकरण में केवल कौन सा फोटोसिस्टम भाग लेता है?

(A) केवल PS – I

(B) केवल PS-II

(C) PS-I और PS-II दोनों

(D) इनमें से कोई नहीं

सही उत्तर (A) केवल PS – I है।

व्याख्या:

चक्रीय फोटोफॉस्फोरिलीकरण (Cyclic Photophosphorylation) तब होता है जब केवल PS-I (P700) उत्तेजित होता है। इसकी मुख्य विशेषताएं निम्नलिखित हैं:

  • इलेक्ट्रॉन का मार्ग: PS-I से निकलने वाला इलेक्ट्रॉन विभिन्न ग्राहियों (जैसे फेरेडॉक्सिन, साइटोक्रोम कॉम्प्लेक्स) से होते हुए वापस PS-I के पास ही लौट आता है। इसीलिए इसे ‘चक्रीय’ कहा जाता है।

  • उत्पाद: इस प्रक्रिया में केवल ATP का निर्माण होता है। इसमें $NADPH$ का निर्माण नहीं होता और न ही ऑक्सीजन मुक्त होती है।

  • स्थान: यह मुख्य रूप से क्लोरोप्लास्ट के स्ट्रोमा लैमिली (Stroma Lamellae) में होता है, क्योंकि वहाँ PS-II और $NADP$ रिडक्टेस एंजाइम अनुपस्थित होते हैं।


PS-II के साथ तुलना:

  • अचक्रीय (Non-cyclic): इसमें PS-I और PS-II दोनों भाग लेते हैं और $ATP$, $NADPH$ तथा $O_2$ तीनों प्राप्त होते हैं।

42. C4 पौधों में CO2 का प्राथमिक स्थिरीकरण कहाँ होता है?

(A) बंडल शीथ कोशिकाओं में

(B) मेसोफिल कोशिकाओं में

(C) स्टोमेटा में

(D) जाइलम में

सही उत्तर (B) मेसोफिल कोशिकाओं में है।

व्याख्या:

$C_4$ पौधों में $CO_2$ स्थिरीकरण की प्रक्रिया दो अलग-अलग स्थानों पर होती है, जो उन्हें $C_3$ पौधों से अधिक कुशल बनाती है:

  • प्राथमिक स्थिरीकरण (Primary Fixation): वायुमंडलीय $CO_2$ सबसे पहले मेसोफिल (Parn-madhyotak) कोशिकाओं में प्रवेश करती है। यहाँ $CO_2$ का प्राथमिक ग्राही 3-कार्बन वाला अणु PEP (फॉस्फोएनोल पाइरूवेट) होता है।

  • एंजाइम: इस प्रक्रिया को PEP-कार्बोक्सिलेज (PEPcase) एंजाइम उत्प्रेरित करता है। यह एंजाइम ऑक्सीजन के प्रति संवेदनशील नहीं होता, इसलिए कम $CO_2$ सांद्रता में भी प्रभावी रहता है।

  • उत्पाद: यहाँ प्रथम स्थायी उत्पाद 4-कार्बन वाला अम्ल ऑक्सेलोएसिटिक एसिड (OAA) बनता है।


द्वितीयक स्थिरीकरण:

बाद में, यह 4-कार्बन अम्ल बंडल शीथ कोशिकाओं में भेजा जाता है, जहाँ $CO_2$ को मुक्त किया जाता है और केल्विन चक्र ($C_3$ चक्र) के माध्यम से शर्करा बनाई जाती है।

43. वह बिंदु जिस पर प्रकाश संश्लेषण की दर श्वसन की दर के बराबर हो जाती है:

(A) संतृप्ति बिंदु

(B) क्षतिपूर्ति बिंदु (Compensation Point)

(C) चरम बिंदु

(D) न्यून बिंदु

सही उत्तर (B) क्षतिपूर्ति बिंदु (Compensation Point) है।

व्याख्या:

पौधों में क्षतिपूर्ति बिंदु वह विशेष अवस्था है जहाँ प्रकाश संश्लेषण और श्वसन की गतियां एक-दूसरे को संतुलित कर देती हैं:

  • प्रक्रिया: प्रकाश संश्लेषण के दौरान पौधा जितनी $CO_2$ का उपयोग करता है, ठीक उतनी ही मात्रा श्वसन (Respiration) की प्रक्रिया में बाहर छोड़ देता है। इसी तरह, श्वसन में उपयोग होने वाली ऑक्सीजन और प्रकाश संश्लेषण में बनने वाली ऑक्सीजन की मात्रा भी बराबर हो जाती है।

  • गैसीय विनिमय: इस बिंदु पर वातावरण के साथ गैसों का शुद्ध विनिमय (Net Exchange) शून्य होता है।

  • समय: यह स्थिति आमतौर पर कम प्रकाश तीव्रता, जैसे सुबह (भोर) और शाम (गोधूलि बेला) के समय देखी जाती है।


अन्य बिंदुओं का अर्थ:

  • संतृप्ति बिंदु (Saturation Point): वह बिंदु जिसके बाद प्रकाश की तीव्रता बढ़ाने पर भी प्रकाश संश्लेषण की दर नहीं बढ़ती।

  • न्यून बिंदु: वह न्यूनतम प्रकाश तीव्रता जहाँ प्रकाश संश्लेषण की प्रक्रिया शुरू होती है।

44. प्रकाश संश्लेषण की दर किस प्रकाश तीव्रता पर अधिकतम होती है?

(A) बहुत कम रोशनी में

(B) मध्यम प्रकाश (इष्टतम तीव्रता) में

(C) बहुत तेज रोशनी (सोलरलाइजेशन) में

(D) पूर्ण अंधेरे में

सही उत्तर (B) मध्यम प्रकाश (इष्टतम तीव्रता) में है।

व्याख्या:

प्रकाश संश्लेषण की दर प्रकाश की तीव्रता से गहराई से जुड़ी होती है, लेकिन यह संबंध एक सीमा तक ही सकारात्मक रहता है:

  • कम प्रकाश में: जैसे-जैसे प्रकाश की तीव्रता बढ़ती है, प्रकाश संश्लेषण की दर भी रैखिक रूप से (linearly) बढ़ती है।

  • इष्टतम तीव्रता (Optimum Intensity): एक मध्यम स्तर पर प्रकाश संश्लेषण की दर अपने अधिकतम बिंदु पर पहुँच जाती है। अधिकांश पौधों के लिए, पूर्ण सूर्य के प्रकाश का केवल 10% ही प्रकाश संतृप्ति (Light Saturation) के लिए पर्याप्त होता है।

  • अत्यधिक तेज रोशनी (Solarization): यदि प्रकाश की तीव्रता बहुत अधिक बढ़ जाए, तो प्रकाश संश्लेषण की दर बढ़ने के बजाय घटने लगती है। ऐसा क्लोरोफिल के फोटो-ऑक्सीकरण (Photo-oxidation) और एंजाइमों के नष्ट होने के कारण होता है। इस स्थिति को सोलरलाइजेशन कहा जाता है।


मुख्य बिंदु:

  • घने जंगलों में रहने वाले पौधों (छायाप्रिय) के लिए संतृप्ति बिंदु बहुत कम होता है।

  • खुले मैदान में उगने वाले पौधों के लिए यह बिंदु थोड़ा उच्च होता है।

 

45. एक अणु ग्लूकोज बनाने के लिए केल्विन चक्र को कितनी बार चलना पड़ता है?

(A) 1 बार

(B) 6 बार

(C) 3 बार

(D) 12 बार

सही उत्तर (B) 6 बार है।

व्याख्या:

केल्विन चक्र (C3 चक्र) के माध्यम से ग्लूकोज के निर्माण की प्रक्रिया को समझने के लिए कार्बन परमाणुओं की गणना महत्वपूर्ण है:

  • कार्बन की गणना: ग्लूकोज का रासायनिक सूत्र $C_6H_{12}O_6$ है, जिसका अर्थ है कि एक ग्लूकोज अणु बनाने के लिए 6 कार्बन परमाणुओं की आवश्यकता होती है।

  • प्रति चक्र स्थिरीकरण: केल्विन चक्र के एक पूरे चक्कर में केवल 1 अणु $CO_2$ का स्थिरीकरण (Fixation) होता है।

  • गणित: चूंकि एक चक्कर से केवल 1 कार्बन प्राप्त होता है, इसलिए 6 कार्बन परमाणु (ग्लूकोज के लिए) प्राप्त करने के लिए इस चक्र को 6 बार घूमना पड़ता है।


6 चक्रों के लिए कुल ऊर्जा की आवश्यकता:

एक ग्लूकोज अणु के निर्माण के लिए केल्विन चक्र में कुल निम्नलिखित ऊर्जा खर्च होती है:

  • ATP: $18$ अणु ($3$ प्रति चक्र)

  • NADPH: $12$ अणु ($2$ प्रति चक्र)

46. जलरंध्र (Hydathodes) कहाँ पाए जाते हैं?

(A) जड़ के शीर्ष पर

(B) पत्तियों के किनारों (शीर्ष) पर

(C) तने की छाल पर

(D) फूलों की पंखुड़ियों पर

सही उत्तर (B) पत्तियों के किनारों (शीर्ष) पर है।

व्याख्या:

जलरंध्र (Hydathodes) पौधों में पाए जाने वाले विशेष प्रकार के छिद्र होते हैं जो ‘बिंदुस्राव’ (Guttation) की प्रक्रिया से जुड़े होते हैं:

  • स्थान: ये मुख्य रूप से घास, टमाटर, और अरबी जैसे शाकीय पौधों की पत्तियों के किनारों (Margins) या शीर्ष (Tips) पर मौजूद शिराओं (Veins) के अंत में पाए जाते हैं।

  • संरचना: जलरंध्र के नीचे ढीली मृदूतक कोशिकाओं का एक समूह होता है जिसे एपिथेम (Epithem) कहा जाता है। ये कोशिकाएं सीधे जाइलम वाहिकाओं से जुड़ी होती हैं।

  • कार्य: जब रात के समय या सुबह के वक्त वातावरण में नमी अधिक होती है और वाष्पोत्सर्जन कम होता है, तो ‘मूल दाब’ (Root Pressure) के कारण अतिरिक्त जल तरल बूंदों के रूप में इन्हीं जलरंध्रों से बाहर निकलता है।


मुख्य अंतर:

  • रंध्र (Stomata): इनसे पानी भाप (वाष्प) के रूप में निकलता है।

  • जलरंध्र (Hydathodes): इनसे पानी तरल बूंदों के रूप में निकलता है और ये हमेशा खुले रहते हैं।

47. ‘रुबिस्को’ एंजाइम पृथ्वी पर सबसे प्रचुर मात्रा में पाया जाने वाला प्रोटीन क्यों है?

(A) क्योंकि यह श्वसन में मदद करता है

(B) क्योंकि यह प्रकाश संश्लेषण में CO2 स्थिरीकरण के लिए अनिवार्य है

(C) क्योंकि यह जड़ों में होता है

(D) यह बहुत तेजी से विभाजित होता है

सही उत्तर (B) क्योंकि यह प्रकाश संश्लेषण में $CO_2$ स्थिरीकरण के लिए अनिवार्य है है।

व्याख्या:

रुबिस्को (RuBisCO) एंजाइम को पृथ्वी पर सबसे प्रचुर मात्रा में पाया जाने वाला प्रोटीन माना जाता है। इसके पीछे के मुख्य कारण निम्नलिखित हैं:

  • सार्वभौमिक उपस्थिति: पृथ्वी पर मौजूद लगभग सभी हरे पौधे, शैवाल और कुछ प्रकाश-संश्लेषी बैक्टीरिया $CO_2$ को शर्करा में बदलने के लिए इसी एंजाइम का उपयोग करते हैं। चाहे वह $C_3$ पौधा हो, $C_4$ हो या CAM, केल्विन चक्र के संचालन के लिए रुबिस्को अनिवार्य है।

  • धीमी कार्यक्षमता: अन्य एंजाइमों की तुलना में रुबिस्को काफी धीमी गति से कार्य करता है। यह एक सेकंड में केवल 3 से 10 अणुओं को ही संसाधित कर पाता है। इस धीमी गति की भरपाई करने के लिए, पौधों को अपनी कोशिकाओं (क्लोरोप्लास्ट के स्ट्रोमा) में इस एंजाइम की बहुत बड़ी मात्रा जमा रखनी पड़ती है।

  • पत्ती का मुख्य भाग: किसी भी हरी पत्ती में मौजूद कुल घुलनशील प्रोटीन का लगभग 30% से 50% हिस्सा अकेले रुबिस्को एंजाइम का होता है।


मुख्य भूमिका:

यह एंजाइम वायुमंडलीय $CO_2$ को $RuBP$ (रिबुलोज-1,5-बिस्फोस्फेट) के साथ जोड़कर कार्बनिक पदार्थ बनाने की पहली सीढ़ी है, जो पृथ्वी पर जीवन के लिए भोजन का आधार है।

48. ‘WARBURG’ प्रभाव क्या है?

(A) CO2 की कमी से प्रकाश संश्लेषण बढ़ना

(B) O2 की उच्च सांद्रता के कारण प्रकाश संश्लेषण की दर कम होना

(C) जल की कमी से पौधों का सूखना

(D) प्रकाश की कमी से क्लोरोफिल का नष्ट होना

सही उत्तर (B) $O_2$ की उच्च सांद्रता के कारण प्रकाश संश्लेषण की दर कम होना है।

व्याख्या:

वॉरबर्ग प्रभाव (Warburg Effect) की खोज जर्मन वैज्ञानिक ओटो वॉरबर्ग ने की थी। यह घटना मुख्य रूप से $C_3$ पौधों में देखी जाती है:

  • सिद्धांत: जब वातावरण में ऑक्सीजन ($O_2$) की सांद्रता बहुत अधिक हो जाती है, तो प्रकाश संश्लेषण की दर में गिरावट आती है।

  • कारण: जैसा कि हम जानते हैं, रुबिस्को (RuBisCO) एंजाइम की $CO_2$ और $O_2$ दोनों के प्रति बंधुता होती है। $O_2$ की उच्च सांद्रता होने पर रुबिस्को $CO_2$ के बजाय $O_2$ से जुड़ जाता है।

  • परिणाम: इससे प्रकाश-श्वसन (Photorespiration) की प्रक्रिया शुरू हो जाती है, जिसमें $CO_2$ का स्थिरीकरण रुक जाता है और ऊर्जा की हानि होती है।


मुख्य बिंदु:

  • यह प्रभाव $C_4$ पौधों में नहीं देखा जाता क्योंकि उनमें $CO_2$ सांद्रता बढ़ाने का अपना तंत्र होता है।

  • कैंसर जीव विज्ञान में भी ‘वॉरबर्ग प्रभाव’ शब्द का प्रयोग होता है, लेकिन पादप कार्यिकी (Plant Physiology) में इसका अर्थ प्रकाश संश्लेषण में ऑक्सीजन द्वारा होने वाला अवरोध है।

49. सुक्रोज का फ्लोएम में स्थानांतरण किस रूप में होता है?

(A) केवल विसरण द्वारा

(B) सक्रिय परिवहन (Energy dependent) द्वारा

(C) केवल परासरण द्वारा

(D) निष्क्रिय परिवहन द्वारा

सही उत्तर (B) सक्रिय परिवहन (Energy dependent) द्वारा है।

व्याख्या:

पत्तियों (Source) में तैयार सुक्रोज को फ्लोएम की चालनी नलिकाओं (Sieve tubes) में पहुँचाने की प्रक्रिया काफी जटिल होती है:

  • लोडिंग (Phloem Loading): मेसोफिल कोशिकाओं से सुक्रोज को फ्लोएम की सहचर कोशिकाओं (Companion cells) और फिर चालनी नलिकाओं में भेजा जाता है। यह प्रक्रिया सांद्रता प्रवणता के विरुद्ध होती है, इसलिए इसमें ATP के रूप में ऊर्जा की आवश्यकता होती है। इसे सक्रिय परिवहन कहते हैं।

  • परासरण दाब: जब सुक्रोज सक्रिय रूप से फ्लोएम में प्रवेश करता है, तो वहाँ जल विभव कम हो जाता है। इसके परिणामस्वरूप पास के जाइलम से पानी परासरण द्वारा फ्लोएम में आता है, जिससे वहाँ उच्च दाब (Turgor Pressure) उत्पन्न होता है।

  • स्थानांतरण: यही उच्च दाब सुक्रोज के घोल को कम दाब वाले क्षेत्रों (Sink – जैसे जड़ या फल) की ओर धकेलता है।


मुख्य बिंदु:

  • फ्लोएम में भोजन का चढ़ना (Loading) और उतरना (Unloading) दोनों ही सक्रिय प्रक्रियाएं हैं।

  • इसके विपरीत, जाइलम में जल का परिवहन मुख्य रूप से निष्क्रिय (Passive) होता है।

50. प्रकाश तंत्र-I (PS-I) का अभिक्रिया केंद्र (Reaction Centre) कौन सा है ?

(A) P – 680

(B) P – 700

(C) P – 600

(D) P – 800

सही उत्तर (B) P – 700 है।

व्याख्या:

प्रकाश संश्लेषण की प्रकाश-अभिक्रिया में दो महत्वपूर्ण प्रकाश तंत्र (Photosystems) कार्य करते हैं। इनमें अभिक्रिया केंद्र (Reaction Centre) क्लोरोफिल-a का एक विशेष अणु होता है:

  • PS-I (प्रकाश तंत्र-I): इसका अभिक्रिया केंद्र P-700 कहलाता है क्योंकि यह 700 nm (नैनोमीटर) की तरंगदैर्ध्य वाले लाल प्रकाश का अधिकतम अवशोषित करता है। यह चक्रीय और अचक्रीय दोनों फोटोफॉस्फोरिलीकरण में भाग लेता है।

  • PS-II (प्रकाश तंत्र-II): इसका अभिक्रिया केंद्र P-680 कहलाता है क्योंकि यह 680 nm की तरंगदैर्ध्य पर प्रकाश का अधिकतम अवशोषण करता है। यह जल के विखंडन और ऑक्सीजन मुक्त करने के लिए उत्तरदायी है।


मुख्य बिंदु:

  • अभिक्रिया केंद्र के चारों ओर सहायक वर्णक (Antenna molecules) होते हैं जो प्रकाश ऊर्जा को इकट्ठा करके केंद्र तक पहुँचाते हैं।

  • PS-I मुख्य रूप से थाइलाकोइड झिल्ली की बाहरी सतह और स्ट्रोमा लैमिली में पाया जाता है।

 

error: Content is protected !!